सरकार द्वारा हाल ही में लड़कियों के विवाह की वैध उम्र बढ़ाकर लड़कों के समान, यानी इक्कीस वर्ष करने संबंधी प्रस्ताव लाया गया है। हालांकि इस पर बहस अब भी ज़ारी है।
फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं कि शादी, विशेषकर लड़कियों के लिये, करियर में कहीं न कहीं अड़ंगा लगा ही देती है। क्योंकि हमारे समाज में विवाह के बाद घर-गृहस्थी का बंधन पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के लिये कहीं अधिक हो जाता है। हालांकि लड़कों के लिये विवाह का वैधानिक प्रावधान पहले ही इक्कीस वर्ष है, पर अब सरकार लड़कियों के लिये भी समान रूप से यही नियम लेकर आई है। ताकि उचित उम्र से पहले विवाह हो जाने से किसी भी लड़की की भविष्य की संभावनायें धूमिल न हों।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में महिलाओं की शादी की उम्र को लेकर एक नई जागरूकता आई है, और यह औसतन 22.1 वर्ष हो चुकी है। लेकिन तमाम प्रावधानों के बावज़ूद बीस से चौबीस साल की 23.3 फ़ीसदी महिलाओं का विवाह अब भी अठ्ठारह वर्ष से पहले हो जाता है। यानी इतने सुधार के बावज़ूद करीब एक चौथाई महिलाओं का ब्याह नाबालिग उम्र में ही हो जाता है। ज़ाहिर है कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह होना, और इससे उनकी स्वतंत्रता, स्वावलंबन और इस तरह गरिमा पर प्रभाव पड़ना अब तक एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

वस्तुतः भारत में महिलाओं की शादी के लिये न्यूनतम उम्र अठ्ठारह वर्ष 1978 में तय की गई थी। जिसे अब केंद्र सरकार बढ़ाकर इक्कीस वर्ष करना चाहती है। सरकार का मानना है कि इससे लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन की दशा-दिशा सुधरेगी। वहीं कुछ 'एक्सपर्ट्स' तो अब भी लड़कियों के विवाह की उम्र में और सुधार की गुंज़ाइश देखते हैं।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री महोदय ने इस बार स्वतंत्रता-दिवस पर लाल-किले की प्राचीर से अपने संबोधन में ये संकेत दे दिये थे, कि सरकार महिला-सशक्तीकरण को लेकर गंभीर है। उन्होंने कहा था -- कि बेटियों को अगर कुपोषण से बचाना है, तो पहले उनके विवाह की उम्र में सुधार लाने की ज़ुरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि, देश में महिलाओं को जब-जब मौका मिला, उन्होंने राष्ट्र को मजबूत बनाने में अपना योगदान दिया। इस दौरान प्रधानमंत्री ने लड़कियों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी, और संकेत दिया था कि लड़कियों के विवाह की उम्र में सुधार संबंधी कोई प्रस्ताव ज़ल्द ही सरकार द्वारा लाया जा सकता है।
इसके बाद तत्संबंधी अध्ययन के लिये सरकार द्वारा पिछले जून में जया जेटली की अध्यक्षता में एक दस सदस्यीय समिति अर्थात् कमेटी गठित की गई। जिसमें नीति आयोग के डॉ. विनोद पॉल सहित दूसरे काबिल लोग भी शामिल हैं। इसमें लड़कियों का विवाह ही नहीं, मां का स्वास्थ्य, चिकित्सा, कल्याण और पोषण, कुल प्रजनन दर, मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर आदि पहलुओं की जांच भी की गई।
मुख्यतः लड़कियों के विवाह की उम्र की जांच करने को बने इस 'टास्क-फ़ोर्स' या कमेटी ने अपने अध्ययनों के पश्चात् इस उम्र-सीमा में इज़ाफ़ा करने की सिफ़ारिश की है। पैनल ने अपने इस अध्ययन के दौरान सोलह विश्वविद्दालयों से युवाओं की राय ली। उक्त कमेटी की सदस्य व 'जामिया मिल्लिया इस्लामिया' की कुलपति नज़मा अख़्तर ने सोलह विश्वविद्दालयों के छात्रों में एक विस्तृत प्रशनावली बांटी थी। इस सर्वे में करीब ढाई हजार छात्रों ने हिस्सा लिया, जिसमें 52 फ़ीसदी छात्रायें थीं। दूर-दराज़ के क्षेत्रों और हाशिये पर रह रहे लोगों तक पहुंचने को करीब पंद्रह 'एनजीओ' संगठनों की मदद ली गई। कुल मिलाकर अध्ययनकर्ताओं की कोशिश यही रही, कि इस सर्वे में समाज के सभी वर्गों, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों का समावेश हो।

इस अध्ययन में 70 फ़ीसदी से अधिक युवाओं ने शादी के लिये लड़कियों की उम्र बढ़ाये जाने का समर्थन किया, जबकि चौबीस प्रतिशत इसे ज़ुरूरी नहीं मानते। गौरतलब है कि इसका समर्थन करने वालों में 60 फ़ीसदी लड़के, जबकि 80 फ़ीसद लड़कियां रहीं। यही नहीं, सर्वे में यह बात भी निकलकर सामने आई, कि अधिकांश युवाओं (67 प्रतिशत) को विवाह की समुचित आयु 26-30 वर्ष लगती है, जबकि बीस प्रतिशत युवाओं ने 21-25 वर्ष को सही माना। वहीं बारह फ़ीसदी युवा ऐसे भी थे, जो तीस की उम्र के बाद ही शादी करने को उचित मानते हैं। ज़ाहिर है विवाह की सही उम्र को लेकर देश के युवाओं का, और उनमें भी खासतौर पर लड़कियों का नज़रिया काफ़ी विकसित हो चुका है।
इस तरह एक व्यापक और समावेशी सामाजिक अध्ययन करने के बाद समिति यानी 'कमेटी' ने लड़कियों के लिये शादी की उम्र सीमा 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने की सिफ़ारिश की है। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि, ऐसा प्रावधान करने से परिवार, महिलाओं और बच्चों पर हर तरह से सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इस प्रस्ताव का उद्देश्य राजनैतिक लाभ लेने या किसी के धार्मिक मामलों में दख़ल देने का कतई नहीं है। यह स्पष्ट रूप से महिलाओं के बेहतर भविष्य को देखते हुये लिया गया निर्णय है।
लड़कियों के विवाह की उम्र की जांच करने को बनी उक्त दस सदस्यीय 'कमेटी' ने अपने अध्ययन के निष्कर्ष में कहा है कि, 'जीवन की आकांक्षाओं, जीवनसाथी और शादी की उम्र आदि के प्रति आज युवाओं के दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।' पर सच तो यह है कि अब भी बहुत से लोगों को लड़कियों की शादी की उम्र को लेकर सचेत होने की ज़ुरूरत है। इसलिये हमारे समाज को ऐसे प्रगतिशील प्रावधानों का स्वागत करना चाहिये।


