प्राचीन समय में पूंजी के लाभप्रद प्रयोग के अवसर बहुत कम थे और प्रया:धनी लोग निर्धन लोगों को उपभोग हेतु ऋण देते थे तथा ब्याज लेते थे! इसलिए ब्याज के हीन दृष्टि से देखा जाता है ! मध्य युग में भी ब्याज लेने की क्रिया को 'ब्याज खोरी ' की संज्ञा दी जाती है!
1) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ब्याज- पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ब्याज का औचित्य इसलिए है कि ब्याज से लोगों में बचत करने की प्रेरणा मिलती है, ब्याज पूंजीगत वस्तुओं की मांग को उचित सेवाओं तक नियंत्रित करती है तथा द्रव्य और अंत में वास्तविक पूंजी को उन उद्योगों में विपरित करती है,जिनमें कि वह सबसे अधिक उत्पादक अर्थात लाभदायक होती हैं!
2) समाजवाद के अंतर्गत ब्याज- मार्क्स के अनुसार केवल श्रम ही उत्पादक होता है, इसीलिए ब्याज के औचित्य को मान्यता नहीं दी जाती है,किंतु यह न्याय संगत नहीं है!समाजवादी देशों में यधपि ब्याज शब्द का प्रयोग नहीं होता,परंतु ब्याज दर चोर दरवाजे में प्रवेश करती है!
Answered By Rajni Patel
Health & nutrition Specialist

