परिवर्तन ही संसार का नियम है। यह बात केवल मनुष्यों पर ही नही बल्कि पेड़ पौधों पर भी लागू है।
हर साल सभी पेड़ सितम्बर से लेकर दिसम्बर महीने तक अपने पेड़ के सभी पत्तों को गिरा देते है। इसे पतझड़ कहते है।
पतझड़ की प्रक्रिया जिन महिनो मे होती है उसे पतझड़ का मौसम कहते है।
पतझड़ के बाद बसंत ऋतु यानी जनवरी माह से मार्च माह तक मे इन पेड़ों पर सुंदर और कोमल कोमल पत्तियाँ उगन लगती हैं।
वसंत ऋतु में मौसम सुहाना हो जाता है ना ज्यादा गर्मी ना ज्यादा ठंड होती है। वसंत ऋतु मे धीरे धीरे दिन बड़े होने लगते है और राते छोटी होने लगती हैं।
उसी प्रकार पतझड़ के मौसम मे सर्दियों के आगमन की तैयारी होती। इसमे दिन छोटे होने लगते है और राते बड़ी होने लगती हैं।
पेड़ों के पत्ते पीले रंग के होकर अपनी शाखा का साथ छोड़ देते है। और बाद मे उसी जगह नये पत्ते उग जाते है।
यह मौसम काफी सुहाना होता है और सभी को यह मौसम बहुत अच्छा लगता हैं।
हल्की हल्की ठंडी हवाएं ना गर्मी का एहसास दिलाती है और ना ही ठंड का।
पक्षी तथा चिडिया अपने घोसलो मे भोजन को एकत्रित करना शुरू कर देते है ताकि उन्हे आने वाले मौसम मे परेशानी ना हो।
इस सुहाने मौसम मे ही बड़े त्योहार जैसे दशहरा, और दीपावली आते है।
पतझड़ के मौसम मे पेड़ों से पत्तियाँ गिरने की प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक होती हैं। सितम्बर का मौसम शुरू होते से पेड़ों की पत्तियाँ पहले पीली, नारंगी होना शुरू होती हैं और दिसम्बर के अंत तक वह इन पत्तियों को अपने पेड़ की शाखाओ से नीचे गिरा देते है।
जब पेड़ों की सुखी पत्तियाँ इस तरह नीचे गिरी हुई होती है तो जमीन पर एक प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देते है ।
प्रकृति द्वारा होने वाली सभी घटनाएं बहुत ही सुंदर होती हैं।







