खतना लैटिन भाषा का शब्द है जो लैटिन शब्द का प्रयोग किया जाता है यह पुरुष का खतना उसने शिशु के अग्र त्वचा को पूरी तरह या आंशिक रूप से हटा देने की प्रक्रिया है.। खतना एक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें लिंग के अगले हिस्से की चमड़ी को हटा दिया जाता है।और यह खतना आमतौर पर नवजात व छोटे बच्चों का किया जाता है। जिसे यह सर्जिकल खतना ऐसी सर्जिकल प्रक्रिया है सिर्फ स्वास्थ्य के लिए नहीं बल्कि धर्म संबंधी उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है यदि बच्चा समय में पैदा हो गया है तो फिर उसके लिंग के संबंधी कई दोष या विकार है तो इसे फिर प्रक्रिया को डाला भी ज़ सकता है। अगर खतना हो गया है तो मेहनत वाली शारीरिक गतिविधि ना करने के लिए सलाह भी दी जाती है। खतना प्रारंभिक चित्रण गुफा चित्रों और प्राचीन मिस्र की कब्रों में मिलते हैं इससे संप्रदाय में पुरुषों का धार्मिक खतना ईश्वर का आदेश माना जाता है.।
खतना क्या है?
'खतना' शल्य क्रिया होने के साथ ही एक प्राचीन प्रथा भी रही है। खासकर यहूदी और इस्लाम जैसे धर्मों के अनुयायियों में यह परंपरा रही है। हालांकि इसके अलावा भी अन्य अनेक लोग लैंगिक स्वास्थ्यगत कारणों से खतना कराते हैं। कहीं यह शैशवावस्था में तो कहीं किशोरावस्था के दौरान भी खतना किया जाता है। खतना प्रक्रिया के प्रायः कुछ अस्पष्ट से भित्ति-चित्र प्राचीन गुफाओं और मिस्र की कब्रगाहों में भी दिखते हैं।
खतना, जिसे अंग्रेजी में 'circumcision' कहते हैं, मूलतः लैटिन भाषा से निकला शब्द है। यह 'circum' (आसपास) और 'caedere' (काटना) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है -- आसपास के हिस्से को काटना। ज़ाहिर है कि यह एक शल्य अथवा 'सर्जिकल' प्रक्रिया है।
पुरुषों का खतना करते हुये उनके लिंग अर्थात् शिश्न के अगले हिस्से की खाल को पूर्णतः या अंशतः काटकर हटा दिया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज संसार के करीब तीस प्रतिशत पुरुष खतना कराते हैं; जिसमें दो तिहाई से अधिक तादाद मुस्लिमों की है।
इसी तरह महिलाओं में उनके योनिभग यानी 'क्लिटोरिस' का खतना किया जाता है। महिलाओं के मामले में इसे 'ख़फ़्ज़' या एफजीएम यानी 'फीमेल जेनेटाइल म्यूलिटेशन' भी कहते हैं। इस संबंध में गौरतलब है कि महिलाओं का खतना संयुक्त-राष्ट्र द्वारा दिसंबर, 2012 में पारित प्रस्ताव के बाद से मानवाधिकारों के उल्लंघन के तौर पर घोषित है। हर साल छः फरवरी इससे संबंधित प्रतीकात्मक अंतर्राष्ट्रीय दिवस अर्थात् 'इंटरनैशनल डे ऑफ़ जीरो टॉलरेंस फ़ॉर एफजीएम' के रूप में निश्चित किया गया है। क्योंकि कथित तौर पर इससे उन्हें कई यौन-स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें पेश आती हैं।
खतने की प्रक्रिया --
गौरतलब है कि खतना की प्रक्रिया यदि किसी काबिल डॉक्टर द्वारा संपन्न की जाती है तो इससे पैदा होने वाले ख़तरे कम से कम रह जाते हैं। खतना के लिये 'सर्जरी' शुरू करने के पहले डॉक्टर स्वास्थ्य संबंधी कुछ अनिवार्य जांच करते हैं। आगे की प्रक्रिया में जननांग के उस हिस्से को 'सुन्न' कर दिया जाता है जिसे खतना करते समय काटना है। 'सुन्न' करने के लिये बड़ों, यानी वयस्कों, के लिये तीन तरह के तरीके हैं, और नवजात बच्चों के लिये चार प्रकार के।
खतना हो जाने के बाद 'सर्जरी' वाली जगह को स्वच्छ और सूखा रखने की सलाह दी जाती है। गीलेपन से संक्रमण यानी 'इंफ़ेक्शन' का ख़तरा बढ़ जाता है, इसलिये इस जगह को नमी और गीलेपन से बचाना होता है। इसके अलावा, बड़ों के मामले में उन्हें कुछ दिनों तक यौनक्रिया अर्थात् 'सेक्स' करने की मनाही होती है। खतना के बाद कम से कम सप्ताह भर तक शारीरिक श्रम करने को मना किया जाता है, और यथासंभव संपूर्ण 'बेड-रेस्ट' की सलाह दी जाती है। एक सप्ताह बाद डॉक्टर फिर से संबंधित जांच करता है। और यदि कोई दिक्कत नज़र नहीं आती तो खतना कराने वाले व्यक्ति को डॉक्टरी निगरानी से मुक्ति मिल जाती है और वह फिर से सामान्य जीवन जीने लगता है।

खतना कराने के फ़ायदे और नुकसान --
खतना कराने के कई फ़ायदे गिनाये जा सकते हैं, और नुकसान भी। इसके फ़ायदों में सबसे पहला यही बताया जाता है कि इससे जननांगों की साफ़-सफ़ाई सुगम हो जाती है, विशेषतः बच्चों के मामलों में। इसके अलावा कहा जाता है कि खतना करवाने के बाद यौन-संक्रमण जैसे एचआईवी के अतिरिक्त कैंसर या फिर मूत्रमार्ग में होने वाले संक्रमण की संभावना भी बहुत कम हो जाती है।
इसके दुष्प्रभावों या जटिलताओं में अनियमित रक्तस्राव, संक्रमण या मूत्रमार्ग का सिकुड़ जाना प्रमुख हैं। इसके अलावा खतना कराने से यौनांगों की संवेदनशीलता में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा गया है।
इस तरह कहा जा सकता है कि 'खतना' जो कि जननांग संबंधी एक शल्य या 'सर्जिकल प्रक्रिया' है, और जो कुछ मानव-समुदायों में पारंपरिक रूप से अनिवार्य है, यदि योग्य और कुशल डॉक्टर की देखरेख में होता है तो इसके दुष्प्रभावों की आशंका न्यूनतम रहती है। इसलिये खतना कराने के पहले किसी भी व्यक्ति को उसके बारे में यथोचित पूरी जानकारी, उसके प्रभाव-दुष्प्रभावों और उससे संबंधित एहतियातों के प्रति सचेत हो जाना चाहिये।
