खजुराहो के मंदीर दुनिया भर मे अपनी कलाआकृतियों की वजह से मशहूर है।
खजुराहो मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले मे स्थित प्राचीन मंदीर है। खजुराहो का नाम खजूर के अध्याधिक पेड़ों के होने की वजह से पड़ा। यहाँ खजुरो के पेड़ों का विशालकाय बगीचा है जिसकी चर्चा चारो और होती हैं।
यहाँ की कामसूत्र मूर्तियाँ लोगो के आकर्षण का केंद्र रहती हैं। लेकिन कई धर्मो के लोगो ने इसे गलत बता कर इसका विरोध किया है उनके अनुसार यह मन्दिर और यहा की कलाकृति अशलील है।
इस मन्दिर का निर्माण 900 ईस्वी से शुरू होकर 1330 ईस्वी तक चंदेल के राजाओं द्वारा करवाया गया था।
चंदेल वंश के राजाओं का यह मानना था की भोग और योग मोक्ष का मार्ग है इसी वजह से उन्होंने अपने जीवन काल के सुख को कामुक आकृतियों मे उकेरा था।
खजुराहो मन्दिर को विश्व पर्यटन स्थल की मान्यता प्राप्त है। इस मन्दिर के निर्माण मे उपयोग मे लाये गए पत्थर की विचित्र है जो शाम के समय मे सूर्य की हल्की हल्की रोशनी पड़ने पर स्वर्ण रंग मे चमकने लगते है।
खजुराहो के अनेको मन्दिर इसी प्रकार से सूर्य की ढलती रोशनी मे चमकते हैं।
इस मन्दिर की कामुक मूर्तियाँ कामसूत्रो के सिद्धांतों पर आधारित है। मन्दिर की दीवारो पर नीचे से ऊपर की और बनाई गई कलाकृति उत्तेजना के चरणो कर अनुसार बनाई गई है।
खजुराहो के राजा चंद्रवर्मन के बारे में एक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है की चंद्रवर्मन की माता हेमवती एक बार किसी सरोवर मे स्नान कर रही थी तब चंद्रदेव ने उनको स्नान करते हुए देख लिया वह हेमवती की सुंदरता को देखकर मोहित हो गए और हेमवती के साथ प्रणय करने की इच्छा जाहिर की। उसके बाद दोनो के प्रणय से चंद्रवर्मन का जन्म हुआ। उसका पालन पोषण हेमवती ने एक नदी करणावती के तट पर ही किया।
चंद्रवर्मन बड़ा होकर बड़ा बलशाली राजा बना। हेमवती ने स्वप्न मे चंद्रवर्मन को एक ऐसा मन्दिर बनवाने की इच्छा बतायी जिसमे मनुष्य के जीवन का अटुट अंग कामशास्त्र की पूर्ण जानकारी हो।
चंद्रवर्मन ने इसी स्वप्न को पूर्ण खजुराहो का मन्दिर बनवा कर किया था।



