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Updated on Nov 15, 2022education

आपकी क्या राय है मृत्यु भोज पर

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Answered on Nov 14, 2022

दोस्तों आज हम इस पोस्ट में मृत्यु भोज के बारे में बात करेंगे समाज में कई सालों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा या प्रथा है कि परिवारिक सदस्य की मृत्यु के उपरांत परिवार के द्वारा समाज को मृत्युभोज करवाना ही होता है इस मृत्यु भोज में सभी जाति के लोगों को भोजन करवाया जाता है पुराने समय में ऐसा ही होता आ रहा है इस तरह से यह प्रथा अभी भी चलती आ रही है जिस परिवार में मृत्यु होती है उस परिवार को 12 दिन के बाद मृत्यु भोजन समाज को करवाना पड़ता है।

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Answered on Nov 13, 2022

आज मैं यहां पर आपको मृत्यु भोज पर अपनी राय बताना चाहती हूं। कि हमें मृत्यु भोज करना चाहिए या नहीं करना चाहिए। मृत्यु भोज की परंपरा तो सदियों से चली आ रही है। लेकिन आज के समय में ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस परंपरा के खिलाफ हैं उनका कहना है कि मृत्यु भोज नहीं करना चाहिए। तो मैं उन लोगों से कहना चाहती हूं कि मृत्यु भोज की परंपरा तो हमारे दादा परदादा ने चलाई थी क्योंकि वह हमसे ज्यादा समझदार रहते थे इसलिए मेरा कहना है कि मृत्यु भोज करना कोई गलत बात नहीं है बल्कि यह एक पुण्य का काम है।Article image

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Updated on Aug 7, 2020
??आजकल मृत्युभोज के विरोध पर बहुत लिखा जा रहा है..मेरा मत अलग है..
मृत्युभोज कुरीति नहीं है. समाज और रिश्तों को सँगठित करने के अवसर की पवित्र परम्परा है,

हमारे पूर्वज हमसे ज्यादा ज्ञानी थे ! आज मृत्युभोज का विरोध है, कल विवाह भोज का भी विरोध होगा.. हर उस सनातन परंपरा का विरोध होगा जिससे रिश्ते और समाज मजबूत होता है..

इसका विरोध करने वाले ज्ञानियों आपके बाप दादाओ ने रिश्तों को जिंदा रखने के लिए ये परम्पराएं बनाई हैं!..., ये सब बंद हो गए तो रिश्तेदारों, सगे समबंधियों, शुभचिंतकों को एक जगह एकत्रित कर मेल जोल का दूसरा माध्यम क्या है,.. दुख की घड़ी मे भी रिश्तों को कैसे प्रगाढ़ किया जाय ये हमारे पूर्वज अच्छे से जानते थे..

हमारे बाप दादा बहुत समझदार थे, वो ऐसे आयोजन रिश्तों को सहेजने और जिंदा रखने के किए करते थे।

हा ये सही है की कुछ लोगों ने मृत्युभोज को हेकड़ी और शान शौकत दिखाने का माध्यम बना लिया, आप पूड़ी सब्जी ही खिलाओ. कौन कहता है की 10 आइटम परोसो..

मैं खुद दिखावे का विरोधी हूँ लेकिन अपनी परंपरा का कट्टर समर्थक हूँ।
कुछ मूर्खों की वजह से हमारे बाप दादाओं ने जो रिश्ते सहजने की परंपरा दी उसे मत छोड़ो, यही वो परम्पराएँ हैं जो दूर दूर के रिश्ते नाते को एक जगह लाकर फिर से जान डालते हैं समय समय पर।

सुधारना हो तो लोगों को सुधारो जो आयोजन रिश्तों की बजाय हेकड़ी दिखाने के लिए करते हैं,

हमारे बाप दादा जो परम्पराएं देकर गए हैं रिश्ते सहेजने के लिए उसको बन्द करने का ज्ञान मत बाटो, वरना तरस जाओगे मेल जोल को,,,,, बंद बिल्कुल मत करो, समय समय पर शुभचिंतकों ओर रिश्तेदारों को एक जगह एकत्रित होने की परम्परा जारी रखो। ये संजीवनी है रिश्ते नातों को जिन्दा करने की।...

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