चलिए दोस्तों आज हम आपको बताते हैं की आल्हा ऊदल किस जाति के थे। :- आल्हा उदल को तो सभी जानते हैं क्योंकि आल्हा ऊदल मां शारदा के भक्त थे और आल्हा ऊदल मां शारदा के भक्त थे,जो मां शारदा के सच्चे मन से भक्ति करते थे और रोजाना सुबह उठकर मां शारदा की पूजा पाठ और उनका श्रृंगार करते थे। मां शारदा आल्हा ऊदल की भक्ति से प्रसन्न होकर उदल को अमर होने का वरदान दी थीं। उदल मंदिर मे आज भी अमर हैं।ऐसा माना जाता है की आल्हा ऊदल की कुलदेवी मां शारदा थी।
चलिए हम आपको बताते हैं की आल्हा ऊदल किस जाति के थे। :-
आल्हा ऊदल चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश से थे इस कारण आल्हा ऊदल अहीर जाति के थे। आल्हा उदल का धाम मैहर क्षेत्र में बना हुआ है जो मां शारदा देवी मंदिर के पीछे है। आल्हा ऊदल महोबा के रहने वाले थे और आल्हा ऊदल महोबा के राजा थे। आल्हा की पत्नी मछला बहुत ही सुंदर थी और उसके चेहरे की चमक बादल के बिजली के चमक के समान थीं। जब मछला नौलक्खाबाद में अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलने जाती है तो पथरीगढ़ का राजा ज्वाला सिंह मछला की चमक को देखकर हैरान हो जाता है और सोचता है की यह बिजली जैसी चमक किसकी है तब ज्वाला सिंह का घोड़ा कहता है कि यह महोबा की रानी मछला के चेहरे की चमक है और ज्वाला सिंह मछला के चेहरे को देखने के लिए इच्छुक हो जाता है और मछला के पास जाता है ।मछला रानी को देखते ही वह उन पर मोहित हो जाता है और उनका अपहरण करने के लिए सोचता है इसके बाद ज्वाला सिंह मछला का हरण करवा लेता है। मछला ज्वाला सिंह से सर्त रखती है की तू एक साल तक मेरा भाई बन कर रहेगा। ज्वाला सिंह को मछला की यह सर्त मंजूर होती है और वह मछला को हाथ तक नहीं लगाता है और मछला का भाई बनकर रहता है। लेकिन एक साल के पहले ही आल्हा और उदल पथरीगढ़ पर विजय प्राप्त करके मछला को घर वापस लाते हैं।


