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Aditya Singla· 6 years ago
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क्या आपको लगता है कि पुलिस लॉकडाउन के दौरान अपनी छवि सुधारने के लिए प्रयास कर रही है?

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Updated on04/28/26
पुलिस एक ऐसा शब्द है जो शब्द सुनते ही मन में सबसे पहले तो खौफ पैदा होता है आपने कुछ किया है या नहीं किया है वह तो दूर की बात है अगर मोहल्ले में कहीं पर पुलिस वाले आ जाते हैं तो सब लोग घर से बाहर निकल कर देखने लगते हैं कि भाई क्या हो गया है आखिर पुलिस क्यों आई है.
 
लाकडाउन के दौरान आपको पुलिस वालों की छवि बिल्कुल ही बिगड़ती हुई दिखाई दी गई होगी.पुलिस वालों ने खुद ही अपनी छवि बिगाड़ ली है. ऐसा लगता है जैसे पुलिस वाले, पुलिस वाले नहीं जल्लाद बन चुके हैं, क्योंकि उनकी हरकत जललादो से बिल्कुल कम नहीं है.आपने सोशल मीडिया पर कई तरह की वीडियो देखी होगी.जिसमें पुलिस वाले लाक डाउन का उल्लंघन करने वाले लोगों का पिछवाड़ा लाल करते देखा होगा और उसके बाद यह पुलिस वाले वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल कर देते हैं. इस तरह से वीडियो वायरल करके किसी की छवि खराब करने का पुलिस वालों को कोई हक नहीं है जिस व्यक्ति की छवि खराब होती है उसको पुलिस वालों पर मानहानि का मुकदमा ठोकना चाहिए वीडियो वायरल करने से कुछ व्यक्ति का समाज में जो मजाक उड़ता है वह बिल्कुल भी सराहनीय योग्य नहीं होता.
 
पुलिस वालों की छवि जितनी लॉक डाउन के समय में खराब हुई है उतनी पहले कभी भी नहीं हुई थी.पुलिस वालों पर हमला होने की कई जगहों से खबरें भी आई हैं.आखिर हमला होने का क्या कारण था इसका कारण यह पुलिस वाले खुद ही हैं इन्होंने ऐसी छवि बना ली है कि कोई भी इन पर हमला भी कर देता है. कोई ज्यादा समय तक इनकी दादागिरी नहीं सह सकता है.
 
अभी कुछ दिनों की बात है एक व्यक्ति अपनी दुकान खोल रहा था पीछे से एक सिपाही आता है और दो डंडे उसके पिछवाड़े पर मार देता है ऐसा पूछने पर दुकानदार कहता है कि आपने मुझे क्यों मारा... वह पुलिस वाला अपनी वर्दी का और तालाबंदी का रोब दिखाते हुए उस पर लाठी-डंडों से आक्रमण कर देता है अब साधारण सी बात है कि कोई इतना अत्याचार करेगा तो कैसे सह सकता है..वह दुकानदार भी अपना आपा खो बैठा और उसने भी पुलिस वाले की जमकर पिटाई कर दी जब पुलिस वाला पिटाई कर रहा था उस वक्त कोई भी बचाने के लिए नहीं आया..जैसे ही वह पुलिस वाले की पिटाई कर देते है. तो पुलिस वाला अपने आला अधिकारियों को भी बुला लेता है मौके पर उस पुलिस वाले की मदद करने के लिए एसीपी एसपी जैसे रैंक के अधिकारी पहुंच जाते हैं और उस दुकानदार को गिरफ्तार करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं.अब आप इससे मुझे बताइए कि इसमें गलती किसकी है.
 
पुलिस वालों का रवैया देखकर ऐसा लगता है उनको यह वर्दी दादागिरी दिखाने के लिए मिली है ना कि लोगों की सेवा करने के लिए... आज इन पुलिस वालों की वजह से हर इंसान के मन में इतना खौफ पैदा हो चुका है कि वह पुलिस वालों के सामने जाने से भी डरता है उनसे कुछ भी बात करने से सौ बार सोचेगा.. कहीं झूठा मुकदमा डालकर अंदर ना कर दें.. इतना कमजोर हो चुका है हमारा कानून कि ऐसे वर्दी धारियों की वजह से आज समाज का एक वर्ग बिल्कुल डरा हुआ है.
 
जबकि इन पुलिस वालों को तनख्वाह भी सरकार देती है सरकार के पास पैसा कहां से आता है जनता से आता है और यह पुलिस वालों का काम कया है जनता की मदद करना है. अपराध को कम करना है.नाकी खुद अत्याचार करना है.मगर पुलिस वालों की हरकत को देख ऐसा लगता है कि खुद ही अपराधी बन चुके हैं.जब मन आ रहा है किसी पर भी डंडे की बौछार कर देते हैं ऐसा लगता है डंडा रबड़ का है और किसी को लगेगा नहीं.
 
धड़क-धड़क डंडे बरसाने वाली पुलिस अब पालघर के मामले में कुछ भी नहीं कर पाते हैं वहां पर लोगों की भीड़ होती है और साधुओं की हत्या कर देते हैं जबकि पुलिस वाले भी अपने कार्य के साथ मौके पर पहुंच जाते हैं मगर पुलिस वाले वहां पर कुछ नहीं कर पाते हैं.पुलिस वाले केवल कमजोर ऊपर ही अत्याचार करना जानते हैं वह चाहते तो रिवाल्वर कमाल कर के साधुओं को बचा सकते थे. उसमें पुलिस वालों की दादागिरी बिल्कुल काम नहीं आती. जबकि ऐसे समय में पुलिस वालों को कुछ भी करके उन तीनों साधुओं को बचाकर सुरक्षित लेकर आना उनकी जिम्मेदारी थी.
 
पुलिस वालों की दिनोंदिन बढ़ रही अत्याचारी की वजह से उनकी छवि बिल्कुल ही धराशाई हो चुकी है वैसे तो धारा से पहले से ही थी और अब और ज्यादा हो चुके हैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता कि पुलिस वालों की छवि अब दोबारा सुधरने के कोई चांस है. जो कुछ बचा खुचा था लाक डाउन में पुलिस वालों ने बिल्कुल ही खो दिया.
 
एक पल मान भी लिया जाए कि पुलिस वालों ने यह सब लोगों की सुरक्षा के लिए किया था चलिए ठीक है. मगर पुलिस वालों ने तो पत्रकारों को भी नहीं छोड़ा. पत्रकार का काम है लोगों को न्यूज़ परोसना. उस समय भी पुलिस वालों ने अपनी दादागिरी के आगे कुछ भी नहीं सोचा. कई पत्रकारों पर भी पुलिस वालों ने हमला करके उनको घायल कर दिया.ऐसे भी कई मामले हाल ही में देखे गए हैं जहां पर पत्रकारों को भी लाठी डंडों से खूब पीटा गया है. पत्रकारों को भी लाठी डंडों से पीटना और उनके साथ दुर्व्यवहार करना पुलिस वालों की घटिया मानसिकता को दर्शाता है साथ ही यह बात भी दर्शाती है कि पुलिस वाले वर्दी के आगे किसी की भी नहीं चल ना देना चाहते हैं ऐसा भी कह सकते हैं कि पुलिस वाले लाकड़ाउन में वर्दी वाला गुंडे का रोल निभा रहे हैं
 
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