कुश्ती महासंघ के प्रमुख और भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों का विरोध प्रदर्शन लंबे समय से चल रहा है जिसमें अब राजनीति भी शामिल हो गई है। क्योंकि पहलवानों ने जहां पहले अपने मंच से विपक्षी नेताओं को दूर रखा था और कई नेताओं को मंच पर जाने से रोक दिया था इस बार ऐसी कोई मनाही नहीं थी। जिसके चलते विपक्ष के कई नेता पहलवानों के विरोध प्रदर्शन में शामिल होते रहे और इसका नतीजा यह हुआ कि पहलवानों का विरोध प्रदर्शन घर-घर तक पहुंच गया लेकिन इस सब के बीच सरकार एकदम चुप रही और उसके मंत्री पहलवनों के विरोध प्रदर्शन पर बोलने से बचते रहे हालांकि राजनाथ सिंह ने मामले की जांच के बाद कार्रवाई की बात जरूर कही। लेकिन अब बीजेपी के अंदर से ही यह चिंता उठने लगी है कि सरकार की इस चुप्पी से आने वाले चुनाव में बीजेपी को बड़ा नुकसान हो सकता है। यह चिंता इसलिए भी सही लगती है क्योंकि कर्नाटक में हाल ही बीजेपी को भारी नुकसान हुआ है और अब मध्यप्रदेश हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में इसी साल चुनाव होने हैं इसलिए बीजेपी नेताओं की चिंता जायज लगती है।

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हरियाणा बीजेपी नेताओं को सता रही है चिंता
दरअसल पहलवानों के धरना प्रदर्शन से सबसे ज्यादा चिंता हरियाणा बीजेपी को ही सता रही है क्योंकि कुछ महीनों में हरियाणा में विधानसभा का चुनाव है और ये पहलवान भी हरियाणा से ही आते हैं। इसलिए बीजेपी को लगता है कि उसे चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। यहां तक कि अब हरियाणा बीजेपी के नेता भी ये मानने लगे हैं कि इस मामले में पार्टी की चुप्पी का उसको खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। अगले साल होने जा रहे लोकसभा और हरियाणा विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पहलवानों के प्रदर्शन को लेकर भाजपा में बेचैनी बढ़ती जा रही है। राज्य के ज्यादातर भाजपा नेता इस मामले पर चुप हैं और कुछ ही ऐसे हैं, जिन्होंने सामने आकर पहलवानों के न्याय की मांग का खुले तौर पर समर्थन किया है।
ग्राउंड लेवल पर पार्टी की छवि को हो सकता है नुकसान
एक अंग्रेजी अख़बार के मुताबिक राज्य के एक भाजपा नेता ने माना है कि इस मामले पर चुप रहना पार्टी को भारी पड़ सकता है। अप्रैल महीने से जारी इस प्रदर्शन को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले तीनों पहलवान साक्षी मलिक, विनेश फोगाट और बजरंग पुनिया हरियाणा से ही हैं। बीजेपी नेता ने कहा कि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें पार्टी की नीतियों के तहत निपटाने की जरूरत है। उन्होंने आगे कहा कि हर किसी में अपने मन की बात को कहने की सिर्फ हिम्मत ही नहीं होनी चाहिए, बल्कि जमीनी स्तर के मुद्दों और सच्चाई को सुनना-समझना भी चाहिए। पहलवानों के प्रदर्शन को लेकर उन्होंने कहा कि इसके पीछे की वजह चाहे जो भी हो, लेकिन अगर इस मामले का कोई हल नहीं निकाला गया था, तो ग्राउंड लेवल पर पार्टी की छवि को झटका लग सकता है।
पहलवानों को बेजीपी नेताओं का भी मिलने लगा है समर्थन
ऐसा लगता है कि पहलवानों के धरने से हरियाणा बीजेपी को नुकसान की आशंका बढ़ने लगी है यही वजह है कि जो भी बीजेपी नेता पहलवानों का समर्थन कर रहे हैं वो हरियाणा से ही हैं। हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने रेस्लर्स की मांगों को पार्टी में ऊपर तक ले जाना का आश्वासन दिया है। तो वहीं, हिसार से भाजपा के सांसद ब्रिजेंद्र सिंह ने कहा कि वह पहलवानों के दर्द और लाचारी को महसूस कर सकते हैं। उनके पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह ने भी जंतर-मंतर पर पहलवानों से मुलाकात की थी।
हरियाणा के अलावा यहां भी हो सकता है नुकसान
हरियाणा के बाद बीजेपी को जहां सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना है वो है पश्चिमी यूपी वैसे तो यूपी में अभी विधानसभा चुनाव नहीं हैं लेकिन अगले साल लोकसभा चुनावों में बीजेपी को यहां बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसकी वजह है पश्चिमी यूपी में जाटों की बड़ी संख्या का होना। यूपी में जाटों की कुल आबादी 6 से 8% बताई जाती है तो वहीं पश्चिमी यूपी में वो 17% से ज्यादा जाट वोटर हैं. 18 लोकसभा सीटों पर जाट वोट बैंक चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता है. इनमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी, और फिरोजाबाद शामिल हैं।
दूसरी तरफ विधानसभा की कुल 120 सीटों पर जाट वोट बैंक असर रखता है. फिलहाल संसद में 24 सांसद जाट हैं. जिनमें सिर्फ 4 सांसद भारतेंदु सिंह, सत्यपाल सिंह, चौधरी बाबूलाल और संजीव बालियान यूपी से हैं. विधानसभा में कुल 14 जाट विधायक हैं. लोकसभा सीटों पर मथुरा में 40%, बागपत में 30%, सहारनपुर में 20% जाट आबादी है. पहलवानों के प्रदर्शन में जाट भी शामिल हो रहे हैं तो क्या लोकसभा चुनाव में पहलवानों के इस विरोध प्रदर्शन का बीजेपी पर यूपी के इन जिलों से कोई असर पड़ेगा?ये सबसे बड़ा सवाल है।
यूपी की इन 10 सीटों पर पड़ सकता है पहलवान के धरने का असर
आंकड़ों के मुताबिक उत्तरप्रदेश की 18 लोकसभा सीटों पर जाट वोटरों का सीधा असर माना जाता है। इनमें बागपत में 30 प्रतिशत जाट वोटरों का दबदबा है. मेरठ में 26 प्रतिशत जाट वोटरों का दबदबा है. ये बीजेपी की परंपरागत सीट भी है. सहारनपुर में 20 प्रतिशत जाट वोटर हैं. मथुरा में 18 प्रतिशत जाट वोटर हैं. अलीगढ़, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, आगरा, कैराना सीटों को भी जाट वोटरों का दबदबा माना जाता है। अब देखना यह है कि क्या बीजेपी को पश्चिमी यूपी की इन सीटों पर और हरियाणा में नुकसान उठाना पड़ेगा या हर बार की तरह बीजेपी अपने धुआंधाड़ प्रचार के जरिए इन मुद्दों को भी हवा कर देगी। क्योंकि बीजेपी किसानों के एक साल से ज्यादा चले आंदोलन के बाद भी कई राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही है और सबसे ज्यादा हैरानी लोगों को यूपी में बीजेपी को जीतते हुए देखकर हुई क्योंकि किसान नेता राकेश टिकैत इसी यूपी से आते हैं जो लगातार आंदोलन करते रहे लेकिन बीजेपी ने चुनाव जीत लिया था।





