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himanshu singh· 5 years ago
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गोरिल्ला या छापामार युद्ध कैसे लड़े जाते थे?

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गोरिल्ला या छापामार युद्ध एक ऐसी युद्ध पद्धति है, जिसमें सीधे मुकाबले के बजाय चालाकी और रणनीति का उपयोग किया जाता है।

इस प्रकार के युद्ध में छोटी टुकड़ियाँ दुश्मन पर अचानक हमला करती थीं और फिर जल्दी से पीछे हट जाती थीं। इसमें जंगल, पहाड़ या कठिन इलाकों का फायदा उठाया जाता था, ताकि दुश्मन को भ्रमित किया जा सके।

सैनिक छिपकर हमला करते थे और सामने से बड़ी लड़ाई से बचते थे। दुश्मन की रसद, संचार और कमजोर स्थानों को निशाना बनाया जाता था।

इस युद्ध पद्धति का उपयोग कई स्वतंत्रता सेनानियों और योद्धाओं ने किया, जैसे शिवाजी महाराज ने भी इसका प्रभावी उपयोग किया था। इसमें तेज गति, योजना और सही समय पर हमला सबसे महत्वपूर्ण होते थे। यह युद्ध शैली कम संसाधनों में भी बड़े दुश्मन को कमजोर करने का एक प्रभावी तरीका मानी जाती थी।

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P
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Answered on03/20/26
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गोरिल्ला युद्ध या छापामार युद्ध प्रणाली
 
छापामार युद्ध हम सभी ने सुना है, पर क्या हम जानते हैं, इस युद्ध की ख़ासियत क्या होती थी और ये युद्ध प्रणाली किस समय उपयोग में लायी जाती थी । आइये जानते है.
 
छापामार युद्ध की का मतलब होता है, छुपकर ,अचानक से हमला करना और मारकर फिर छुप जाना । इसका उपयोग तब किया जाता था, जब एक छोटी सी सेना को एक बड़ी सेना से लड़ना होता था ..
 
गुरिल्ला या गेर्रीया ( guerrilla ) शब्द, जो छापामार के अर्थ में प्रयुक्त होता है, स्पैनिश भाषा का है । स्पैनिश भाषा में इसका अर्थ लघुयुद्ध है । मोटे तौर पर छापामार युद्ध अर्धसैनिकों की टुकड़ियों अथवा अनियमित सैनिकों द्वारा शत्रुसेना के पीछे या पार्श्व में आक्रमण करके लड़े जाते हैं । वास्तविक युद्ध के अतिरिक्त छापामार अंतर्ध्वंस का कार्य और शत्रुदल में आतंक फैलाने का कार्य भी करते हैं ।
 
इस युद्ध का उपयोग कई बार लुटेरी प्रजातियों ने भी किया है... इन लुटेरे छापामारों को पहचानना कठिन होता था । इनकी कोई विशेष वेशभूषा नहीं होती थी । दिन के समय ये साधारण नागरिकों की भाँति रहते और रात को छिपकर आतंक फैलाते हैं । छापामार नियमित लोगों को धोखा देकर विध्वंस कार्य करते थे ।
 
विश्व इतिहास में इस युद्ध प्रणाली का उपयोग करीब 2000 वर्ष पहले चीन में हुआ करता था... जिसका जिक्र इतिहास में है, पर भारत मे ऐसे युद्ध का जिक्र सर्वप्रथम #महाराणा_प्रताप को लेकर हुआ है । महाराणा प्रताप ने इस पद्धति का उपयोग अकबर की सेना के विरूद्ध किया था । प्रताप ने दिवेर के युद्ध मे इसी पद्धति से मुगलों को इतना नुकसान पहुंचाया की उन्हें मेवाड़ से भागना पड़ा ।
 
बाद में महाराणा प्रताप से प्रेरित होकर छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसका उपयोग मलेच्छो के खिलाफ किया था ।
बाद में मराठा सेना ने भी इसी युद्ध नीति के सहारे, अपने दुश्मनों को बहुत परेशान किया था...
 
शिवजी महाराज जी के बाद, इस युद्ध नीति का प्रयोग बुंदेलखंड के महान हिन्दू राजा छत्रशाल बुंदेला ने औरंगजेब की सेना के खिलाफ किया था, राजा छत्रसाल ने सिर्फ कुछ सैनिको के साथ ही इस युद्धनीति से बुंदेलखंड से मुगलों को सफाया कर दिया था....
 
इसलिए इस छापामार युद्धनीति का भारत के संघर्ष काल मे बहुत योगदान रहा है...
जब छोटी छोटी टुकड़ियों ने एक बड़ी सेना को चुनौती दी हो... और कैसे ये युद्धनीति पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही..
 
जय महाराणा प्रताप - जय शिवाजी महाराज
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S
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Updated on03/20/26
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