क्या आप अपनी ज़िंदगी को 4 पंक्तियों में समेट सकते हैं ? - letsdiskuss
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Brij Gupta

Optician | पोस्ट किया |


क्या आप अपनी ज़िंदगी को 4 पंक्तियों में समेट सकते हैं ?


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Marketing Manager | पोस्ट किया


ज़िंदगी को 4 पंक्ति में समेटना थोड़ा मुश्किल है | क्योकि ज़िंदगी में हर कोई इंसान 4 पल सूकून के हमेशा ढूढ़ता रहता है | जब उसको सूकून ही नहीं मिलता तो ज़िंदगी कैसे सिमट सकती है | फिर भी एक छोटी सी कोशिश है, कि शायद ज़िंदगी के कुछ पहलु समेट सकूं |

कुछ पहलु ज़िंदगी के :-

" जो ग़म दे वो ज़िंदगी
जो ग़म हर दम दे वो ज़िंदगी
जो सिर्फ तकलीफ भरा सफ़र ही न दे
जो साहिल भी दर्द से भरा दे वो ज़िंदगी...."

Letsdiskuss


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Thinker | पोस्ट किया


ज़िन्दगी का फलसफा भी कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं |


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@letsuser | पोस्ट किया


चार पंक्तियों में अगर मै अपनी ज़िन्दगी व्यक्त करूँ तो वह पंक्तिया यह होंगी :-


"ऐ ज़िन्दगी तेरे लिबास तले मेरी रूह सिमट रही है
तेरी सर्द परत मुझे कचोट रही है
फिर भी तुझे ओढ़ने से रोकू कैसे खुदको
तुझसे ही मेरी साँसे चल रही है |"


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Marketing head | पोस्ट किया


जन्म हुआ तब माँ की भाहे थी ज़िन्दगी

चलना सिखा तब पाठशाला बनी ज़िन्दगी

बड़ा जब कद मेरा तब बनी मेरी साथी मेरी जिन्दगी

और जब दुनिया तकलीफ में भी सलाम करे हौसलो को आपके उसे कहते है ज़िन्दगी ।


अगर आपको मेरा उत्तर पसंद आया हो तो कृपया कर ऐसे ही हौसलो वाले पोस्ट पढ़िये मेरे ब्लॉग पर लिंक आपको मिल जाएगी नीचे

https://zindagimeriteacher.blogspot.com/2018/09/zindagi-meri-teacher-soch-aur-dar.html?m=1


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Optician | पोस्ट किया


ज़िन्दगी का सफर
है ये कैसा सफर
कोई समझा नहीं
कोई जाना नहीं |



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B.A. (Journalism & Mass Communication) | पोस्ट किया


ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले

हमने भी तेरे हर एक ग़म को

गले से लगाया है

है न ! 


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Technical executive - Intarvo technologies | पोस्ट किया


वो चार कदम हम चल न सके

वो जो चल न सके तो बैठ गए

फिर बैठे बैठे जो नींद लगी

हम नींदो में ज़िन्दगी भूल गए | 


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Content Writer | पोस्ट किया


हर कदम पर जो इम्तेहान ले वो ज़िंदगी,

हर वक़्त जो नया ग़म दे वो ज़िंदगी,

न दे जो सिर्फ जीने की उमीदें

जो मरने के लिए थोड़ी सी ज़मीन भी दे वो ज़िंदगी.............


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Content writer | पोस्ट किया


ज़िंदगी पढ़ रही हूँ, अलग अलग तरीको से 

कभी खूब सुर्खिया बटोर लेती हूँ,,

कभी गिर पड़ती हूँ धम्म से,

मै ज़िंदगी हूँ गिरती हूँ , टूटती हूँ ,संभल जाती हूँ 

जैसे तैसे समझो कट ही जाती हूँ |


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Engineer,IBM | पोस्ट किया


हर कदम पर इम्तेहान लेती है ये ज़िंदगी,

कुछ न कहो फिर भी क्यों सहती है ये ज़िंदगी,

वक़्त बेवक्त एक आहट महसूस करता है ये दिल,

न जाने किस हद तक बदलेगी ये ज़िंदगी


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@letsuser | पोस्ट किया


ज़िंदगी के इम्तेहान को कोई समझ नहीं सका

वक़्त का तूफ़ान कभी थम नहीं सका

जब भी सोचा ज़िंदगी जिएंगे अब खुल के

तभी न जाने क्यों ज़िंदगी को ये सहन न हो सका........


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