नैतिक मूल्यों का अभिमान किसी बलात्कारी के अंदर वह डर पैदा नहीं कर सकता जो मौत की सज़ा कर सकती है | यह कहना सही है कि बलात्कारी कभी भी पीड़ित लड़की का दर्द नहीं समझ सकता परन्तु वह अकेला नहीं है जो यह दर्द नहीं समझता| प्रत्येक व्यक्ति जिसने इस दुर्भाग्यपूर्ण अपराध का सामना नहीं किया है ,वह इस आघात का एहसास करने में , उसे समझने में विफल है। अगर ऐसा नहीं है तो लोगों को मोमबत्ती लेकर सड़को पर निकलने की ज़रूरत नहीं होती और अपराधियों को मौत की सजा के साथ दंडित करने की अपील नहीं की जा रही होती | देश में बलात्कार की संख्या में हो रही वृद्धि को रोकने का एकमात्र समाधान अपराधी को मौत की सजा देना है।
न्याय में हमारी धारणा सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखी जब उसने दिल्ली की एक लड़की निर्भया, जिसका 2012 में बलात्कार कर क़त्ल कर दिया गया था, के बलात्कारियों को मौत की सजा देने का फैसला सुनाया, । हमें भारत में अदालतों से इस तरह के फैसले की जरूरत है क्योंकि यहां जब महिलाओं की सुरक्षा की बात आती है तो क़ानून अविश्वसनीय साबित होते हैं।
यह कुछ हद तक सांत्वनादायक था जब सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की, "अपराध की क्रूर, बर्बर और शैक्षिक प्रकृति एक सभ्य समाज को नष्ट करने के लिए 'सदमे की सुनामी' ला सकती है।"
हमारे देश के ऐसे हालातों के बाद भी देश के लोगो के विचार महिलाओ के खिलाफ ही है | इससे अधिक दुखद बात यह है कि इनमें से अधिकतर लोग देश के बड़े नेता और अधिकारी हैं, जो हमारे देश को नियंत्रित करते हैं। यह इन लोगों की वजह से है कि भारत को नवीनतम Rheut reports के अनुसार महिलाओं के लिए दुनिया में सबसे असुरक्षित देश माना जाता है
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Translated by Team Letsdiskuss