यह दोहा संत कबीरदास जी से संबंधित माना जाता है, जिसमें उन्होंने जीवन की एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीख दी है। इस दोहे का अर्थ यह है कि हमें अपने जीवन में निंदा करने वाले लोगों को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वे बिना किसी खर्च और प्रयास के हमारी कमियों को बताकर हमें सुधारने में मदद करते हैं।
इस दोहे में कहा गया है कि “निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय” यानी निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए, चाहे वह झोपड़ी जैसी साधारण जगह ही क्यों न हो। इसका भाव यह है कि निंदक व्यक्ति हमारे सबसे नजदीक रहना चाहिए ताकि वह हमेशा हमारी गलतियों को बता सके।
आगे कहा गया है “बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय”। इसका अर्थ है कि निंदक व्यक्ति बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव को साफ और शुद्ध कर देता है। यानी वह हमें हमारी गलतियाँ दिखाकर हमें सुधारने का अवसर देता है, जिससे हमारा व्यवहार और व्यक्तित्व बेहतर बनता है।
इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि हमें निंदा करने वालों से नाराज नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि वे हमारे विकास में मदद करते हैं। अक्सर लोग अपनी गलतियाँ खुद नहीं देख पाते, लेकिन निंदक लोग उन्हें स्पष्ट रूप से बता देते हैं।
आज के समय में भी यह दोहा बहुत उपयोगी है। यदि कोई व्यक्ति हमारी आलोचना करता है, तो हमें उसे दुश्मन नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसकी बातों में छिपे सुधार के अवसर को समझना चाहिए। सही आलोचना हमें और बेहतर बनने में मदद करती है।
यहां एक और दिलचस्प विषय है जिसका आप आनंद ले सकते हैं: तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे अपने शब्दों में समझाएं?


