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V
Mar 7, 2026education

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इस दोहे का क्या अर्थ है?

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@jitendraapnadesigyan6731Mar 6, 2026

"निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय" ।।

कबीर दास जी कहते हैं कि जो हमारी निंदा करता है उ।से हमें अपने पास ही रखना चाहिए मैं। तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर। हमारे स्वभाव को ही शुद्ध करता।

संत कबीर दोहे #32

"कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर"।।.

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@divyasharma6473Jun 15, 2022

संत कबीर दास जी हिंदी भाषा में अपने लोकप्रिय दोहे से काफी प्रसिद्ध है। इन्होंने एक से बढ़कर एक विख्यात दोहे को प्रकाशित किया है। निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इनका यह दोहा भी काफी लोकप्रिय है और प्रसिद्ध रहा है दोहे का बहुत ही गहरा अर्थ होता है।

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कबीर दास जी के इस दोहे की पहली लाइन का अर्थ यह है कि हमें अपने आलोचकों की बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए। क्योंकि आलोचक ही हमें हमारी कमजोरियों को बता सकते हैं। और फिर उसके बाद हम अपनी कमजोरियों को समझ कर उनमें सुधार कर सकते हैं। इसीलिए आलोचक हमारा सबसे बड़ा मित्र होता है। कबीर दास ने इस दोहे में में यही बताया है|


अतः कबीर दास जी का इस दोहे के माध्यम से कहने का मतलब यह है कि हमें अपने आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। और वह हमारी कमी को साबुन की बातें साफ कर सकते हैं। जैसी आप पानी से नहा कर निर्मल हो जाते हैं। वैसे ही अगर आप अपने आलोचकों को पास में रखेंगे। तो फिर आपको अपनी कमजोरी और कमी पता चल जाएगी और वे आपकी उन्नति करने में काफी लाभकारी साबित होंगे।

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अर्थात इस दोहे का अर्थ यह है कि हमारी कमियां निकालने वाले चाहे वह हमारे आलोचक हो। या वे हमारे मित्र हो, हमें उनको अपने पास रखना चाहिए। क्योंकि वही हमें हमारे स्वभाव में परिवर्तन करके हमें निर्मल बना सकते हैं। और फिर इससे हमारी उन्नति हो सकती है।


व्यवहार में कबीर दास जी के इस दोहे का अर्थ यह है, कि हमें अपने विरोध करने वालों की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। हमें उनका भी हृदय से सम्मान करना चाहिए और आपने निंदा को स्वीकार करना चाहिए।

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@rameshkumar7346Mar 7, 2026

यह प्रसिद्ध दोहा महान संत कबीरदास जी द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने बताया है कि हमारे जीवन में आलोचकों (बुराई करने वालों) का क्या महत्व है।

दोहे का अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि हमें अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास (आंगन में कुटी बनवाकर) रखना चाहिए। जिस प्रकार हम शरीर या कपड़ों को साफ करने के लिए पानी और साबुन का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार निंदक बिना पानी और साबुन के ही हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव (चरित्र) को निर्मल और शुद्ध कर देता है।

सीख: अपनी बुराई सुनकर क्रोधित होने के बजाय हमें उसे आत्म-सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। निंदक अनजाने में ही हमारे व्यक्तित्व को निखारने में हमारी मदद करता है।

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