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Vansh Chopra· 6 साल पहले
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निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इस दोहे का क्या अर्थ है?

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अपडेट किया गया09/16/26

“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥”

शब्दार्थ

निंदक — हमारी कमियाँ या गलतियाँ बताने वाला व्यक्ति

नियरे — पास

आँगन कुटी छवाय — अपने आँगन में ही उसकी छोटी-सी झोपड़ी बना दें

बिन पानी, साबुन बिना — बिना किसी बाहरी साधन के

निर्मल करे सुभाय — हमारे स्वभाव और चरित्र को शुद्ध कर देता है

दोहे का विस्तृत अर्थ

कबीरदास जी कहते हैं कि हमें ऐसे व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए जो हमारी कमियाँ, गलतियाँ और बुरी आदतें ईमानदारी से बताता है। आमतौर पर इंसान अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करता है और आलोचना करने वाले व्यक्ति से दूर रहना चाहता है। लेकिन कबीरदास जी इसके विपरीत सलाह देते हैं।

जो व्यक्ति हमारी गलतियाँ बताता है, वह हमें अपनी कमियों को पहचानने और उन्हें सुधारने का अवसर देता है। इसके लिए हमें किसी साबुन या पानी की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि आलोचना हमारे स्वभाव को अंदर से बेहतर और निर्मल बनाने का काम करती है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई हमें बताए कि हम दूसरों की बात बीच में काट देते हैं, जल्दी गुस्सा हो जाते हैं या किसी काम में लापरवाही करते हैं, तो हमें तुरंत नाराज़ होने के बजाय सोचना चाहिए कि उसकी बात में कितनी सच्चाई है। यदि गलती सच में है, तो उसे सुधारना चाहिए।

मुख्य संदेश

इस दोहे का मुख्य संदेश है कि सच्ची और उचित आलोचना हमारे विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। हमें केवल अपनी तारीफ करने वाले लोगों के बीच नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे लोगों की बात भी सुननी चाहिए जो हमारी कमियाँ ईमानदारी से बताते हैं।

हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर निंदा सही होती है। सही आलोचना वही है जो हमारी भलाई और सुधार के उद्देश्य से की जाए।

सारांश

कबीरदास जी कहते हैं कि आलोचना करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वह हमारी कमियों को बताकर हमें उन्हें सुधारने का अवसर देता है। जिस तरह साबुन और पानी शरीर की गंदगी साफ करते हैं, उसी तरह सच्ची आलोचना हमारे स्वभाव और व्यवहार की कमियाँ दूर करके हमें बेहतर इंसान बनाती है।

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अपडेट किया गया06/05/26

यह दोहा संत कबीरदास जी से संबंधित माना जाता है, जिसमें उन्होंने जीवन की एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीख दी है। इस दोहे का अर्थ यह है कि हमें अपने जीवन में निंदा करने वाले लोगों को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वे बिना किसी खर्च और प्रयास के हमारी कमियों को बताकर हमें सुधारने में मदद करते हैं।

इस दोहे में कहा गया है कि “निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय” यानी निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए, चाहे वह झोपड़ी जैसी साधारण जगह ही क्यों न हो। इसका भाव यह है कि निंदक व्यक्ति हमारे सबसे नजदीक रहना चाहिए ताकि वह हमेशा हमारी गलतियों को बता सके।

आगे कहा गया है “बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय”। इसका अर्थ है कि निंदक व्यक्ति बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव को साफ और शुद्ध कर देता है। यानी वह हमें हमारी गलतियाँ दिखाकर हमें सुधारने का अवसर देता है, जिससे हमारा व्यवहार और व्यक्तित्व बेहतर बनता है।

इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि हमें निंदा करने वालों से नाराज नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि वे हमारे विकास में मदद करते हैं। अक्सर लोग अपनी गलतियाँ खुद नहीं देख पाते, लेकिन निंदक लोग उन्हें स्पष्ट रूप से बता देते हैं।

आज के समय में भी यह दोहा बहुत उपयोगी है। यदि कोई व्यक्ति हमारी आलोचना करता है, तो हमें उसे दुश्मन नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसकी बातों में छिपे सुधार के अवसर को समझना चाहिए। सही आलोचना हमें और बेहतर बनने में मदद करती है।

यहां एक और दिलचस्प विषय है जिसका आप आनंद ले सकते हैं: तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे अपने शब्दों में समझाएं?

Tara Verma
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Tara Verma is a practising teacher and education content writer with over 10 years of classroom experience across primary and secondary levels. She holds a Master's degree in Education (M.Ed.) from Delhi University and a Bachelor of Education (B.Ed.) from Jamia Millia Islamia — qualifications that ground her writing in both pedagogical theory and the day-to-day realities of teaching in India. Her content covers exam preparation strategies, learning methodologies, curriculum guidance, student mental health, career counselling for students, and the evolving state of school and higher education in India. Her work has appeared on platforms including TeacherVision India, Jagran Josh, and Careers360, where she writes for students, parents, and fellow educators who need content built on actual teaching experience — not theory alone. Over a decade of working directly with students across age groups and learning levels has given Tara a practical understanding of how education content should be written — clearly, accessibly, and with genuine awareness of the challenges students and teachers face on the ground. She has taught 1,000+ students, contributed to school curriculum development initiatives, and published 250+ articles on education across digital platforms. She is an active member of the National Council of Teachers of English (NCTE) India. Across all her writing, every recommendation is classroom-tested, every insight comes from direct teaching experience, and every article is held to the same standard she applies in her own classroom — accuracy, clarity, and genuine usefulness for the reader.

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जवाब दिया गया03/07/26

यह प्रसिद्ध दोहा महान संत कबीरदास जी द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने बताया है कि हमारे जीवन में आलोचकों (बुराई करने वालों) का क्या महत्व है।

दोहे का अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि हमें अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास (आंगन में कुटी बनवाकर) रखना चाहिए। जिस प्रकार हम शरीर या कपड़ों को साफ करने के लिए पानी और साबुन का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार निंदक बिना पानी और साबुन के ही हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव (चरित्र) को निर्मल और शुद्ध कर देता है।

सीख: अपनी बुराई सुनकर क्रोधित होने के बजाय हमें उसे आत्म-सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। निंदक अनजाने में ही हमारे व्यक्तित्व को निखारने में हमारी मदद करता है।

Ramesh Kumar
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अपडेट किया गया05/28/26

संत कबीर दास जी हिंदी भाषा में अपने लोकप्रिय दोहे से काफी प्रसिद्ध है। इन्होंने एक से बढ़कर एक विख्यात दोहे को प्रकाशित किया है। निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इनका यह दोहा भी काफी लोकप्रिय है और प्रसिद्ध रहा है दोहे का बहुत ही गहरा अर्थ होता है।

 

लेख की तस्वीर
कबीर दास जी के इस दोहे की पहली लाइन का अर्थ यह है कि हमें अपने आलोचकों की बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए। क्योंकि आलोचक ही हमें हमारी कमजोरियों को बता सकते हैं। और फिर उसके बाद हम अपनी कमजोरियों को समझ कर उनमें सुधार कर सकते हैं। इसीलिए आलोचक हमारा सबसे बड़ा मित्र होता है। कबीर दास ने इस दोहे में में यही बताया है|

अतः कबीर दास जी का इस दोहे के माध्यम से कहने का मतलब यह है कि हमें अपने आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। और वह हमारी कमी को साबुन की बातें साफ कर सकते हैं। जैसी आप पानी से नहा कर निर्मल हो जाते हैं। वैसे ही अगर आप अपने आलोचकों को पास में रखेंगे। तो फिर आपको अपनी कमजोरी और कमी पता चल जाएगी और वे आपकी उन्नति करने में काफी लाभकारी साबित होंगे।

 

लेख की तस्वीर
अर्थात इस दोहे का अर्थ यह है कि हमारी कमियां निकालने वाले चाहे वह हमारे आलोचक हो। या वे हमारे मित्र हो, हमें उनको अपने पास रखना चाहिए। क्योंकि वही हमें हमारे स्वभाव में परिवर्तन करके हमें निर्मल बना सकते हैं। और फिर इससे हमारी उन्नति हो सकती है।

व्यवहार में कबीर दास जी के इस दोहे का अर्थ यह है, कि हमें अपने विरोध करने वालों की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। हमें उनका भी हृदय से सम्मान करना चाहिए और आपने निंदा को स्वीकार करना चाहिए।

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जवाब दिया गया10/15/22

मोती एक लग्जरी विलासिता वाला साबुन है। मोती साबुन के निर्माता कौन है कंपनी का नाम क्या है मालिक का क्या नाम है इन सब बातों के साथ ही हम आपको बताने जा रहे हैं कि मोती साबुन इतना लोकप्रिय और महंगा क्यों होता है।

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मोती साबुन के निर्माता कंपनी का नाम क्या है

पिछले 30 सालों से मोती साबुन को हिंदुस्तान युनिलीवर कंपनी बना रही है। साबुन इस समय ₹58 के दाम में आता है. डेढ़ सौ ग्राम इसका वजन होता है। चंदन और गुलाब की खुशबू वाला दो ही कैटेगरी में साबुन दिखाई देता है। इसके बावजूद भी अदा साबुन आज भी लग्जरी साबुन में शुमार है। अगर आप इस साबुन से ठंडी में स्नान करते हैं तो आपकी त्वचा ड्राई नहीं होती है।

मोती साबुन इतना फेमस क्यों हो गया

दोस्तों आपको बता दें कि मोती साबुन इसलिए इतना फेमस हो गया क्योंकि यह लग्जरी साबुन है। इसे खास मौके पर लोग स्नान के लिए और शादी विवाह के रस्मों में गिफ्ट के तौर पर देते हैं। अब आपको बताते हैं कि मोती साबुन का विज्ञापन खासतौर पर दिवाली में दिया जाता था कंपनी के द्वारा आज इसमें कहा जाता था कि यह दिवाली आ गई है अब दिवाली में मोती से स्नान करें शुद्ध हो जाए। इस कारण से मोती साबुन बहुत लोकप्रिय हो गया क्योंकि इसका विज्ञापन खास मौके पर आने लगा।

मोती साबुन विलासिता वाला साबुन brand luxury shop Chandan है। महंगा साबुन है‌। इसको लोग इस्तेमाल शादी विवाह के मौके पर करते हैं। मोती सबसे महंगा होता है उसके प्रति किलो पर यह बना मोती साबुन वास्तव में एक लग्जरी साबुन बन गया है। भारती शादी विवाह में इस साबुन का इस्तेमाल होने लगा।

लोग गिफ्ट के तौर पर भी मोती साबुन luxury shop भेंट करने लगे। मोती साबुन से नहाने से त्वचा चमकदार बनती है इसमें खास से महंगे पदार्थ और प्रकृति से बने तीनों का इस्तेमाल होता है इस कारण से या महंगा होता है और त्वचा को नुकसान भी नहीं पहुंचाता है।

मोती साबुन Moti shop के बारे में कुछ विशेष जानकारियां

80के दशक में या साबुन इतना लोकप्रिय था कि लोग इसे इस्तेमाल करते थे। आज के समय में यह दिवाली और त्यौहार के खास मौके पर ही लोग इस इस्तेमाल करते हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें सन 2010 में यह साबुन की बिक्री थोड़ी कम हो गई थी लेकिन नए विज्ञापन रणनीति में इस विज्ञापन के कारण या फिर से पहले जैसी पॉपुलर साबुन हो गया।

Abhishek kant
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Abhishek Kant Educator | Journalist | Writer About Me / परिचय Master of Journalism & Mass Communication (MJMC) degree holder with extensive experience in journalism, teaching, and content writing. Passionate about sharing knowledge, telling impactful stories, and inspiring others through meaningful content. मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री के साथ पत्रकारिता, अध्यापन और कंटेंट राइटिंग का समृद्ध अनुभव। अपने लेखन और शिक्षण के माध्यम से लोगों तक सही जानकारी और विचार साझा करना ही मेरी प्रेरणा है।

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अपडेट किया गया05/28/26

"निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय" ।।

कबीर दास जी कहते हैं कि जो हमारी निंदा करता है उ।से हमें अपने पास ही रखना चाहिए मैं। तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर। हमारे स्वभाव को ही शुद्ध करता।

संत कबीर दोहे #32

"कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर"।।.

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