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Vansh Chopra· 6 years ago
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निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इस दोहे का क्या अर्थ है?

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संत कबीर दास जी हिंदी भाषा में अपने लोकप्रिय दोहे से काफी प्रसिद्ध है। इन्होंने एक से बढ़कर एक विख्यात दोहे को प्रकाशित किया है। निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इनका यह दोहा भी काफी लोकप्रिय है और प्रसिद्ध रहा है दोहे का बहुत ही गहरा अर्थ होता है।

 

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कबीर दास जी के इस दोहे की पहली लाइन का अर्थ यह है कि हमें अपने आलोचकों की बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए। क्योंकि आलोचक ही हमें हमारी कमजोरियों को बता सकते हैं। और फिर उसके बाद हम अपनी कमजोरियों को समझ कर उनमें सुधार कर सकते हैं। इसीलिए आलोचक हमारा सबसे बड़ा मित्र होता है। कबीर दास ने इस दोहे में में यही बताया है|

अतः कबीर दास जी का इस दोहे के माध्यम से कहने का मतलब यह है कि हमें अपने आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। और वह हमारी कमी को साबुन की बातें साफ कर सकते हैं। जैसी आप पानी से नहा कर निर्मल हो जाते हैं। वैसे ही अगर आप अपने आलोचकों को पास में रखेंगे। तो फिर आपको अपनी कमजोरी और कमी पता चल जाएगी और वे आपकी उन्नति करने में काफी लाभकारी साबित होंगे।

 

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अर्थात इस दोहे का अर्थ यह है कि हमारी कमियां निकालने वाले चाहे वह हमारे आलोचक हो। या वे हमारे मित्र हो, हमें उनको अपने पास रखना चाहिए। क्योंकि वही हमें हमारे स्वभाव में परिवर्तन करके हमें निर्मल बना सकते हैं। और फिर इससे हमारी उन्नति हो सकती है।

व्यवहार में कबीर दास जी के इस दोहे का अर्थ यह है, कि हमें अपने विरोध करने वालों की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। हमें उनका भी हृदय से सम्मान करना चाहिए और आपने निंदा को स्वीकार करना चाहिए।

Answered by
D
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Updated on05/28/26
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यह दोहा संत कबीरदास जी से संबंधित माना जाता है, जिसमें उन्होंने जीवन की एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीख दी है। इस दोहे का अर्थ यह है कि हमें अपने जीवन में निंदा करने वाले लोगों को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वे बिना किसी खर्च और प्रयास के हमारी कमियों को बताकर हमें सुधारने में मदद करते हैं।

इस दोहे में कहा गया है कि “निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय” यानी निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए, चाहे वह झोपड़ी जैसी साधारण जगह ही क्यों न हो। इसका भाव यह है कि निंदक व्यक्ति हमारे सबसे नजदीक रहना चाहिए ताकि वह हमेशा हमारी गलतियों को बता सके।

आगे कहा गया है “बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय”। इसका अर्थ है कि निंदक व्यक्ति बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव को साफ और शुद्ध कर देता है। यानी वह हमें हमारी गलतियाँ दिखाकर हमें सुधारने का अवसर देता है, जिससे हमारा व्यवहार और व्यक्तित्व बेहतर बनता है।

इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि हमें निंदा करने वालों से नाराज नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें धन्यवाद देना चाहिए क्योंकि वे हमारे विकास में मदद करते हैं। अक्सर लोग अपनी गलतियाँ खुद नहीं देख पाते, लेकिन निंदक लोग उन्हें स्पष्ट रूप से बता देते हैं।

आज के समय में भी यह दोहा बहुत उपयोगी है। यदि कोई व्यक्ति हमारी आलोचना करता है, तो हमें उसे दुश्मन नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसकी बातों में छिपे सुधार के अवसर को समझना चाहिए। सही आलोचना हमें और बेहतर बनने में मदद करती है।

यहां एक और दिलचस्प विषय है जिसका आप आनंद ले सकते हैं: तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे अपने शब्दों में समझाएं?

Answered by
Tara Verma
Tara VermaTen years in the classroom, shaping minds — bringing the same clarity and purpose to every piece she writes about education.
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Tara Verma is a practising teacher and education content writer with over 10 years of classroom experience across primary and secondary levels. She holds a Master's degree in Education (M.Ed.) from Delhi University and a Bachelor of Education (B.Ed.) from Jamia Millia Islamia — qualifications that ground her writing in both pedagogical theory and the day-to-day realities of teaching in India. Her content covers exam preparation strategies, learning methodologies, curriculum guidance, student mental health, career counselling for students, and the evolving state of school and higher education in India. Her work has appeared on platforms including TeacherVision India, Jagran Josh, and Careers360, where she writes for students, parents, and fellow educators who need content built on actual teaching experience — not theory alone. Over a decade of working directly with students across age groups and learning levels has given Tara a practical understanding of how education content should be written — clearly, accessibly, and with genuine awareness of the challenges students and teachers face on the ground. She has taught 1,000+ students, contributed to school curriculum development initiatives, and published 250+ articles on education across digital platforms. She is an active member of the National Council of Teachers of English (NCTE) India. Across all her writing, every recommendation is classroom-tested, every insight comes from direct teaching experience, and every article is held to the same standard she applies in her own classroom — accuracy, clarity, and genuine usefulness for the reader.

Updated on06/05/26
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यह प्रसिद्ध दोहा महान संत कबीरदास जी द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने बताया है कि हमारे जीवन में आलोचकों (बुराई करने वालों) का क्या महत्व है।

दोहे का अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि हमें अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास (आंगन में कुटी बनवाकर) रखना चाहिए। जिस प्रकार हम शरीर या कपड़ों को साफ करने के लिए पानी और साबुन का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार निंदक बिना पानी और साबुन के ही हमारी कमियां बताकर हमारे स्वभाव (चरित्र) को निर्मल और शुद्ध कर देता है।

सीख: अपनी बुराई सुनकर क्रोधित होने के बजाय हमें उसे आत्म-सुधार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। निंदक अनजाने में ही हमारे व्यक्तित्व को निखारने में हमारी मदद करता है।

Answered by
Ramesh Kumar
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Answered on03/07/26
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"निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय" ।।

कबीर दास जी कहते हैं कि जो हमारी निंदा करता है उ।से हमें अपने पास ही रखना चाहिए मैं। तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर। हमारे स्वभाव को ही शुद्ध करता।

संत कबीर दोहे #32

"कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर"।।.

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Answered by
J

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Updated on05/28/26
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