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shweta rajput· 5 years ago
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क्या है मोदी जी का चक्रव्यूह ?

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Updated on10/04/20
मोदी जी का चक्रव्यूह

भारत चीन के बीच लद्दाख क्षेत्र में जो सीमा विवाद चल रहा है, वंहा आज चीन भारत को नही भारत चीन को धमका रहा है।

इस मुद्दे पर कांग्रेसी शहजादे व उनके चमचे निरंतर कह रहे हैं की चीन भारत की सीमा में अंदर घुस आया है, बहुत अंदर घुस आया है और हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है जबकि मोदी सरकार कहती है की नहीं घुसा है। मीडिया खबरों में भी बहुत से समझदार लोगों को यही कहते सुना होगा की चीन अंदर तक घुस आया है।

यह सब खेल झूठ को बारम्बार बोल सच साबित करने का है। वास्तविकता यह है की चीन उस क्षेत्र में घुसा हुआ है जो की बफर ज़ोन है। जी हाँ ये स्वीकार्य सच है कि चीन एलएसी को पार करके भारत की ओर आगे तक बफर जोन में आ बैठा है। ऐसे में एक तरह से वह भले भारत की सीमा में नहीं है या हमारी कोई पोस्ट उनके कब्जे में नहीं है, परंतु भारी फौज के साथ वह बफर ज़ोन में बैठा ज़रूर है।

लेकिन सैन्य रणनीतिकारों के हिसाब से असल सच ये है की भारत ने उसे वहाँ फंसा लिया है। भारत ने उसे दाना ड़ाल के अपने जाल में फंसाया है और अब न आगे बढ़ने दे रहा न पीछे हटने दे रहा है।

अब महत्वपूर्ण सवाल है की ऐसा आखिर क्यों?

तो जनाब इसके लिए भारत की चाणक्य नीति समझनी होगी। जो दिखाई देता है वह असल में होता नहीं है और जो होता है वह असल में दिखाई नहीं देता है।

असल में ये हमारे प्रिय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय में हुए आर्थिक अपराध से संबंधित हैं। जिसकी वजह कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक अदृश्य करार है,जो देखने में घोटाला जैसा तो नहीं लगता है लेकिन समझने में महा घोटाला ही है,वो भी लाखों करोड़ का।

भारत को चीन का उपनिवेश बनाने के इस खेल की शुरुवात सोनियां गांधी द्वारा कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच 2007 में एक समझौते से शुरू हुआ। जिसमे कांग्रेस ने चीन से समझौता किया कि दोनों पार्टियां आपस में एक दूसरे की हर तरह से मदद करेंगी। कांग्रेस ने चीन से आधिकारिक रूप से कुछ फंड लिया, कुछ अन्य लाभ लिए, जिसकी जांच सरकार अभी कर रही हैं।

इस एवज में चीन ने कांग्रेस सरकार से चीनी व्यापार को भारत में बढाने के लिए छूट लेनी शुरू की, सब्सिडी, आयात शुल्क, निर्यात शुल्क, सरकारी कान्ट्रेक्ट, सरकारी आर्डर व बहुतेरी सरकारी योजनाओं में खरबों डालर का निवेश किया। इसी वजह से चीनी कंपनियाँ भारत में बड़ी संख्या में आई व सरकार इनको सब्सिडी देती रही, जिसकी वजह से चीन में बना सामान भारत में लागत से भी कम रेट में पड़ने लगा। जिससे भारतीय कंपनियां चीन से आयात हुए सामान से कम दामों पर सामान नहीं दें पाई, जिससे भारतीय कंपनियों का सामान बिकना लगभग बंद होने लगा। जब सामान नहीं बिका तो भारतीय कंपनियां बंद होने लगी, जिससे भारत में बेरोजगारी बढी उधर चीन मालामाल होने लगा।

इस सबमें भारत देश को 30 लाख करोड़ का घाटा हुआ है और चीन को इस से भी ज़्यादा फायदा हुआ। यही है कांग्रेस व चीनी एमओयू का अदृश्य घोटाला, जिसमें मुख्य रुप से गांधी परिवार मुख्य भूमिका में हैं।

अब इसकी अदृश्य घोटाले की काट,भारत को आत्मनिर्भर बना कर किया जा सकता था और उसका मौका स्वयं प्रकृति या कहिये चीन के वायरस ने ही दे दिया।

करोड़ों युवाओं को रोजगार देने का लक्ष्य, देश को पांच ट्रिलियन डालर इकोनोमी तक ले जाने का लक्ष्य, किन्तु ये सब तभी संभंव तंहा जब भारत की जरूरत का सामान भारत में ही बने, भारतीय कंपनियां बनाएं, भारतीय लोग बनाएं, भारतीय लोग भारत में बना स्वदेशी सामान खरीदें।

किंतु ये सब जब तक संभंव नहीं हो सकता जब तक कि चीनी कंपनियां भारत से भाग न जाए और जब तक भारतीय लोग भारत में बना सामान खरीदने और चीन में बना सामान का बहिष्कार का प्रण न लें लें ၊

अब समस्या थी कि इन चीनी कंपनियों को भारत कैसे भगाये और भारतीय लोगों को चीनी सामान, चीनी एप से कैसे दूर किया जाए ?

चूंकि WTO का सदस्य होने की वजह से यह नियम है कि भारत चीन से व्यापार बंद नहीं कर सकता न ही अकारण प्रतिबंध लगा सकता। केवल युद्ध की स्थिति में ही किसी देश पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाया जा सकता है ၊

चीनी सामाचार पत्र और चीनी सरकार कई बार कानूनों की धमकी भी देते रहें हैं कि भारत चीन के एप बैन नहीं कर सकता और चीन से व्यापार बंद नहीं कर सकता लेकिन वो भूल गया कि इस समय भारत के प्रधानमंत्री तीक्ष्ण बुद्धि वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुभवी स्वयंसेवक है, जो दुश्मन को मात कैसे देनी है, इसे अच्छी तरह से जानते हैं।

अतएव मोदी सरकार ने एक गूढ़ नीति बनाई कि चीन को कैसे घेरा जाए, ताकि चीन को भारत में आर्थिक रूप से निषिद्ध किया जा सके और उसे भारी आर्थिक चोट पहुंचाई जा सके।

योजना के तहत मोदी जी व उनके सहयोगी मंत्रियों ने ऐसे ऐसे बयान देना शुरू किया जिससे चीन भड़के। गृहमंत्री का संसद में वह बयान याद कीजिये जिसमें उन्होने ठसके से कहा था की जान दे देंगे, लेकिन अपनी ज़मीन नहीं देंगे। उसमें POK के साथ साथ अक्साई चिन का भी ज़िक्र हुआ था। शायद तभी से चीन को अक्साई चीन जाने का ड़र सता रहा है।

उधर गिलगित बाल्टिस्तान में तो चीन की जान ही फंसी हुई है क्यूंकी उसके बिना तो उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना अधूरी रह जाऐगी, जिस पर चीन अरबों डॉलर खर्च कर चुका है।

इस कारण चीन अक्साई चीन को बचाने के चक्कर में अपने पीओके के सीपैक प्रोजेक्ट को बीच में छोडकर, लद्दाख में सड़कें और रेल मार्ग बनाने में जुट गया, बस तभी मोदी सरकार का प्लान कामयाब हो गया ၊

चीन आदतानुसार लद्दाख में LAC पार करके अंदर तो आया लेकिन वह इस बात के लिए तैयार नहीं था की भारत कोई प्रतिक्रिया देगा और बात लड़ाई तक आ जाएगी। गलवान घाटी के बफर जोन में सैनिक भिड़ गए, जिसमें 20 भारतीय सैनिक बलिदान हुए। सैनिकों की मौत से मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का बन गया और अब इस राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को बीच में ला कर भारत धड़ाधड़ चीनी कंपनियों को बाहर का रास्ता दिखाये जा रहा है।

मोदी सरकार सोनिया कांग्रेस के किए कारनामों से, चीनी कंपनियों से आसानी से छुटकारा नही पा सकते थे, क्योंकि WTO का कानून ऐसा करने से रोकता है, लेकिन अब कर सकते हैं, क्योंकि इस झड़प के बाद चीन ने डर वश भारतीय सीमा पर सेना लाकर खड़ी कर दी।

अब तो चीन जैसे ही पीछे हटने की भी कोशिश करता है तो भारत उसे फिर से उकसा देता है। कमांडर लेवल की मीटिंग में एक ही शर्त भारत की तरफ से रखी जाती है कि LAC से पीछे बफर जोन छोड़ चीनी क्षेत्र में रहोगे तो ही बात बनेगी, इससे कम में कोई समझौता मंजूर नहीं।

घमंडी चीन कैसे पीछे हटे, हटा तो विश्व समुदाय में बेईज्जती भी होगी और भारत अक्साई चिन भी मांगेगा फिर या वहां युद्ध करेगा। इसीलिए भारत धड़ाधड वहां सड़कें पुल व रेलमार्ग बना रहा है। चीन तो अब समझौते पर आने लगाहै किंतु भारत की अपनी सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करने को लेकर ऐसी शर्ते हैं जो चीन मानने को तैयार नहीं होता। इसलिए सीमा पर तनाव है, पर शायद युद्ध न हो। लेकिन मोदी सरकार की कूटनीती के कारण चीन को चारों ओर से घेर लिया गया है।

साउथ चाईना सी में अमेरिकी युद्ध बेड़े पूरी तैयारी के साथ चीन को ध्वस्त करने के ईरादे से तैनात है। जिसके साथ तीस देशों का नाटो समूह एक साथ चीन पर हमले को तैयार है। चीन की तरफ से जरा सी हलचल अब उसका ही खात्मा करने का कारण होगी।कोरोना वायरस के कारण अमेरिकी जनहानि व अर्थहानि और दुबारा चुने जाने की आवश्यकता ने ट्रंप को चीन से बदला लेने को बाध्य कर रही।

मोदी सरकार की कुशल कूटानिति चीन को चारों ओर से घेर चुकी है। चीन के सामने एक ही रास्ता है बचने का कि वो अक्साई चीन और पीओके के रास्ते से हट जाए, क्यों कि मोदी का भारत इन्हें हर कीमत पर वापस लेनें को दृढ़ प्रतिज्ञ दिखता है।

युद्ध तो किसी के भी हक़ में नहीं,इसलिए बड़े स्तर का युद्ध न भारत करेगा और न चीन।

लड़ाई एक अलग मुद्दा है लेकिन पहले भारत चीन की रीढ़ पर प्रहार कर रहा है। जैसे नोटबन्दी कर पाकिस्तान की आर्थिक रीढ तोड़ी थी। वैसे भारत चीनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से तोड़ तो न सकता लेकिन उसे कमजोर और स्वयं को सशक्त तो ज़रूर कर सकता है।

सीमा पर तनाव बनाए रखना अब भारत के और विश्व के हक़ में है और भारत यही कर रहा है। चीन की रीढ़ पर भारत अपने हिस्से का प्रहार कर रहा है बाकी विश्व अपने हिस्से का करेगा। अमेरिका, रुस, आस्ट्रेलिया, जापान, फ्रांस, ताईवान, ईटली अब मोदी की राह पर चल रहें हैं अब ऐसे में चीन की बर्बादी तय है। गोला,बारुद मिसाइल से या फिर अर्थव्यवस्था से, किसी भी हमले में चीन का बिखर जाना तय है।उधर चीन की जनता भी गुलामों की तरह जिंदगी जीते जीते ऊब चुकी है और स्वतंत्रता चाहती है।

अंतराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की हेकड़ी, बत्तमीजी व कश्मीर पर समर्थन समाप्त होते देख इतना भरोसा हो चुका है कि मोदी है तो सब मुमकिन है। मोदी सरकार अब चीन के उत्पात से आजादी पाकर ही दम लेगी ये भरोसा बनता जा रहा है।



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