भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश में जीत के क्या कारण रहे? - letsdiskuss
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Ramesh Kumar

Marketing Manager | पोस्ट किया |


भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश में जीत के क्या कारण रहे?


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Social Activist | पोस्ट किया


तमाम अटकलबाजियों पर विराम लगाते हुये भाजपा एक बार फिर दो-तिहाई के प्रबल बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ हो चुकी है। पार्टी को इस विधानसभा चुनाव में 274 सीटों पर जीत हासिल हुई, जबकि निकटतम प्रतिद्वंद्वी मानी जा रही समाजवादी पार्टी इसके आसपास भी न आने सकी और उसे केवल 128 सीटों से संतोष करना पड़ा। तो वहीं कांग्रेस और बसपा तो भाजपा की इस आंधी में बस येन-केन अपना वज़ूद बचा पाईं, जिन्हें क्रमशः दो और एक सीटें मिलीं। चुनाव में भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस का वोट शेयर क्रमशः 42 32 12 फीसदी रहा।

हालांकि ओपिनियन पोल से लेकर एग्ज़िट पोल और दूसरे तमाम सर्वेक्षणों में कुछ ऐसी ही आशा जताई जा रही थी। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं को लेकर भाजपा की वापसी पर कुछ आशंकायें भी लोगों के जेहन में थीं। अब राजनैतिक पंडित एक बार फिर इस चुनाव के नतीज़ों का विश्लेषण करने में मशगूल हैं। कि भाजपा की इस प्रचंड वापसी के पीछे कौन सा सबक छिपा हुआ है!

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दरअसल इस बीच किसान-आंदोलन, तमाम सरकारी भर्तियों में गड़बड़ी, महंगाई, ज़हरीली शराब, पुलिस ज्यादती वगैरह से भाजपा सरकार की काफी किरकिरी हो रही थी। दूसरी तरफ पार्टी में असंतुष्ट लोगों की तादाद भी बढ़ती जा रही थी। ऐन चुनाव के समय दर्जनों नेताओं के पार्टी छोड़ देने का भी दबाव पार्टी पर था। इसके बावज़ूद यह भाजपा शीर्ष नेतृत्व का आत्मविश्वास ही था कि उसने सौ से अधिक (१०४) मौज़ूदा विधायकों के टिकट काटकर वहां से नये प्रत्याशियों को लड़ाया। और इनमें अस्सी सीटें वापस जीत भी ली।

इससे ज़ाहिर होता है कि उत्तर-प्रदेश में भाजपा की वापसी में एक बार फिर पार्टी और केंद्रीय नेतृत्व काफी असरदार साबित हुआ। लोगों ने कैंडीडेट की बजाय पार्टी को देखकर कहीं ज्यादा वोटिंग की। सीएसडीएस और लोकनीति द्वारा कराये गये सर्वे इस बात की पुष्टि करते हैं, जिसमें तीन-चौथाई यानी हर चार में से तीन मतदाताओं ने व्यक्ति की बजाय पार्टी के नाम पर वोट देना स्वीकार किया।

मुद्दों की बात करें तो सर्वे में 32 फीसदी लोगों ने विकास के नाम पर तो बारह फ़ीसदी ने सरकार बदलने के लिये वोट करने की बात की। यानी सामान्य जनता सरकार बदलने की नहीं बल्कि इसी सरकार के साथ विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है। पर दूसरी तरफ किसानों के मुद्दे आश्चर्यजनक रूप से खामोश रहे। और इसकी सबसे बड़ी गवाही देती है लखीमपुर के निघासन विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के शशांक वर्मा को भारी अंतर से मिली जीत। गौरतलब है कि पिछले दिनों किसान-आंदोलन के दौरान इसी क्षेत्र में कथित तौर पर एक केंद्रीय मंत्री के बेटे द्वारा आंदोलनरत किसानों को कुचलने की घटना सामने आने पर सरकार की बड़ी फ़जीहत हुई थी। नमी महोदय के इस्तीफ़े की मांग होने लगी। हालांकि वो अब भी अपने पद पर बरकरार हैं। और उनके क्षेत्र में भाजपा विधानसभा चुनाव सम्मानजनक स्कोर के साथ जीत चुकी है। वहीं इस चुनाव में बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दे खामोश ही रह गये।

राजनीति के जानकारों के मुताबिक इस चुनाव में भाजपा की वापसी में उसे बसपा के वोटों का ट्रांसफ़र होना भी एक बड़ा फैक्टर रहा है। जिसे पिछली बार से लगभग दस फीसदी कम वोट मिले। माना जाता है कि जाति-फैक्टर के आधार पर ये वोट भाजपा को गये। हालांकि वोट प्रतिशत सपा का भी बढ़ा है।

अगर बात करें भाजपा के सबसे ज्वलंत हिंदू-फैक्टर की तो यह हर तरह से भाजपा के पक्ष में रहा। इस बार भाजपा को 2017 के 47 फीसदी से अधिक करीब 54 फीसदी हिंदुओं का वोट मिला। यही नहीं, इस बार हिंदू वोटरों की तादाद में भी इज़ाफा दिखा। खास बात यह रही कि मुस्लिम बहुल सीटों पर हिंदू वोटर भाजपा के पक्ष में लामबंद हो गये। बीस से चालीस प्रतिशत तक मुस्लिम आबादी वाले विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को हिंदुओं का औसतन साठ फ़ीसदी, और चालीस प्रतिशत से ऊपर मुस्लिम आबादी वाले विधानसभा क्षेत्रों में करीब सत्तर फ़ीसदी वोट मिला। भाजपा की सीटें बढ़ाने में इस फैक्टर की अहम भूमिका रही।

इसके अलावा भाजपा की वापसी की मुख्य वज़ह यह रही कि विपक्ष महिलाओं को साधने में नहीं कामयाब हुआ। जबकि भाजपा उज्ज्वला और लाभार्थी योजना के ज़रिये महिला-वोटरों को लुभाने में कामयाब रही। इसके चलते भाजपा को पुरुषों के 44 प्रतिशत के सापेक्ष महिलाओं के 46 फीसदी वोट मिले। जबकि निकटतम प्रतिद्वंद्वी सपा को क्रमशः 33 और 39 फीसदी महिलाओं और पुरुषों ने वोट दिया। मुफ़्त राशन जैसी आकर्षक योजना के यूपी में अस्सी प्रतिशत वोटर लाभार्थी हैं।


कुल मिलाकर देखें तो उत्तर प्रदेश के भाजपा का आकर्षण और मोदी-लहर का जादू अभी बरकरार है। साथ ही भाजपा शीर्ष नेतृत्व की सधी हुई चुनावी रणनीति का भी भाजपा की विजय-यात्रा ज़ारी रखने में अहम योगदान है। जिसके दम पर सूबे में एक बार फिर अगले पांच सालों के लिये पार्टी की सरकार पुख़्ता हो चुकी है।


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