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Mar 19, 2026astrology

आखिर पिता की चिता को बड़ा बेटा ही मुखाग्नि क्यों देता है?

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5 Answers

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Oct 9, 2022

सच तो यह है कि इस दुनिया मे हमने जन्म लिया है लेकिन एक दिन हमारी मृत्यु निश्चित है। हिन्दू धर्म मे मृत्यु से सबंधित बहुत से नियम बनाये गये है जैसे कि किसी की मृत्यु हो जाने पर समसान घाट मे लड़कियां, औरते नहीं जा सकती है और वही दूसरी ओर चिता कों अग्नि औरते नहीं दे सकती है सिर्फ लड़का ही चिता कों अग्नि दे सकता है। हिन्दू धर्म के अनुसार मृत्यु से संबंधित एक रहस्य यह भी है कि चिता कों अग्नि सिर्फ घर का बड़ा बेटा ही दे सकता है ऐसा इसलिए होता है जिस व्यक्ति की मृत्यु हुयी है वह नरक मे ना जाए उसको यदि उसका बड़ा बेटा अग्नि देता है तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।Article image

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Oct 11, 2022

क्या आप जानते हैं कि हमारे हिंदू धर्म में ऐसा भी होता है कि जब किसी पिता की मृत्यु हो जाती है तो उसके चिता को अग्नि केवल उसका बड़ा पुत्र ही देता है आखिर ऐसा क्यों होता है क्या आपने कभी सोचा है चलिए हम आपको बताते हैं कहा जाता है कि कई सारे जन्मों के पुण्य कमाने के बाद ही पुत्र की प्राप्ति होती है। इसलिए पिता की आत्मा को शांति मिले, और उन्हें नर्क पर ना जाना पड़े इसलिए पिता की अग्नि केवल बड़े पुत्र को ही दी जाती है ऐसा करने से पिता की आत्मा को स्वर्ग प्राप्त होता है।Article image

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Oct 11, 2022

हमारे हिंदू शास्त्र के अनुसार पिता को अग्नि केवल बड़े पुत्र या छोटे पुत्र के द्वारा ही दी जाती है। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब बड़ा बेटा अपने पिता को अग्नि देता है तो उसकी आत्मा को शांति मिलती है और वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। अगर उनका बड़ा बेटा किसी कारण बस उनको अग्नि देने नहीं आ सकता है तब छोटा बेटा भी उनको अग्नि दे सकता है।Article image

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S
Mar 17, 2026

मृत्यु’ जीवन का अंतिम और अटल सत्य माना जाता है,जिसे कोई टाल नहीं सकता है, जिसने इस दुनिया मे जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होंगी और मत्यु के बाद उसका किसी ना किसी रूप मे पुनर्जन्म निश्चित होगा,यह कथन श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहा गया है।श्रीकृष्ण के अनुसार जीवन और मृत्यु एक च्रक के समान चलता रहता है इस स्थिति से हर व्यक्ति को गुजरना पड़ता है, गीता के अनुसार मृत्यु के बाद मनुष्य के जीवन का नया आरंभ होता है,इसलिए मनुष्य की मृत्यु के कुछ समय बाद अंतिम संस्कार के नियम का पालन किया जाता है, जिससे जीवात्मा को मरणोपरांत स्वर्ग और अगले जन्म में उसे उत्तम शरीर की प्राप्ति मिले, मनुष्य इस जन्म मे मृत्यु होती है तो उसका पुनर्जन्म किसी ना किसी जीव, जंतु, जानवर के रूप मे होता है, मनुष्य के रूप मे पुनर्जन्म मिलने मे 7 बार जीव, जंतु रूप मिलने के बाद ही मनुष्य के रूप मे जन्म होता है, मनुष्य के रूप मे पुनर्जन्म मिलना बहुत ही कठिन होता है।

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल मिलाकर सोलह संस्कार होते हैं, इनमें से मृत्यु आखिरी यानि सोलहवां संस्कार होता है,मृत्यु संस्कार में मृतक की अंतिम विदाई होती है,दाह संस्कार और आत्मा की शांति के लिए कई रीति-रिवाज तथा नियम बनाये जाते है,शास्त्रों में भी अंतिम संस्कार के नियमों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है,माना जाता है कि जिन व्यक्तियों की मृत्यु के बाद विधि-विधान से अंतिम संस्कार नहीं किया जाता उनकी आत्मा प्रेत की तरह चारो ओर भटकती रहती है और उन्हें कई तरह का कष्ट झेलना पड़ता है,इसलिए मृतक़ का अंतिम संस्कार विधि -विधान के साथ करना चाहिए ताकि उन्हें मोक्ष प्राप्ति हो यानि उनकी आत्मा क़ो शांति मिले।

यहाँ पर पूछा गया है कि हिंदू धर्म के अनुसार पिता की चिता को बड़ा पुत्र ही अग्नि क्यों देता है?
यदि हिन्दू धर्म के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद उसकी चिता क़ो अग्नि पुत्री देती है, यह शास्त्रों के अनुसार अनुचित माना जाता है। किसी कन्या या महिला को चिता क़ो अग्नि देने या शमशान घाट में जाने का भी अधिकार नहीं दिया जाता है,क्योकि शास्त्रों के अनुसार यदि पिता की चिता क़ो अग्नि उसकी बेटी देती है तो उसके पिता की आत्मा क़ो शांति नहीं मिलती है यानि स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है, उनकी आत्मा भटकती रहती है।

हिदु धर्म के अनुसार चाहे माता हो या पिता की चिता क़ो बड़ा पुत्र ही अग्नि ही देता है,इस संबंध में हमारे शास्त्रों का कहना है कि पुत्र पु नामक नर्क से बचाता है अर्थात् पुत्र के हाथों से पिता की चिता क़ो अग्नि मिलती है तो पिता क़ो स्वर्ग प्राप्त होता है। इसी मान्यता के आनुसार पुत्र होना कई जन्मों के लिए पुण्यों का फल मिलता है।
क्योकि बड़ा पुत्र माता-पिता का अंश होता है। इसी वजह से बड़े पुत्र का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी चिता क़ो अग्नि देकर पुत्र होने का ऋण अदा कर सके।

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V
Mar 17, 2026

यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता है, जो प्राचीन समय से चली आ रही है। इस परंपरा के अनुसार बड़ा बेटा परिवार का मुख्य उत्तराधिकारी माना जाता है। इसलिए अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी उसी पर होती है। इसे अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।Antyeshti में मुखाग्नि देना आत्मा की शांति और मोक्ष से जुड़ा माना जाता है। परंतु आज के समय में अगर बड़ा बेटा मौजूद न हो, तो परिवार का कोई अन्य सदस्य भी यह संस्कार कर सकता है। इस प्रकार यह परंपरा कर्तव्य, सम्मान और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी हुई मानी जाती है।

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