Krishna Patel
Krishna Patel· 3 years ago
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आखिर पिता की चिता को बड़ा बेटा ही मुखाग्नि क्यों देता है?

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मृत्यु’ जीवन का अंतिम और अटल सत्य माना जाता है,जिसे कोई टाल नहीं सकता है, जिसने इस दुनिया मे जन्म लिया है उसकी मृत्यु अवश्य होंगी और मत्यु के बाद उसका किसी ना किसी रूप मे पुनर्जन्म निश्चित होगा,यह कथन श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहा गया है।श्रीकृष्ण के अनुसार जीवन और मृत्यु एक च्रक के समान चलता रहता है इस स्थिति से हर व्यक्ति को गुजरना पड़ता है, गीता के अनुसार मृत्यु के बाद मनुष्य के जीवन का नया आरंभ होता है,इसलिए मनुष्य की मृत्यु के कुछ समय बाद अंतिम संस्कार के नियम का पालन किया जाता है, जिससे जीवात्मा को मरणोपरांत स्वर्ग और अगले जन्म में उसे उत्तम शरीर की प्राप्ति मिले, मनुष्य इस जन्म मे मृत्यु होती है तो उसका पुनर्जन्म किसी ना किसी जीव, जंतु, जानवर के रूप मे होता है, मनुष्य के रूप मे पुनर्जन्म मिलने मे 7 बार जीव, जंतु रूप मिलने के बाद ही मनुष्य के रूप मे जन्म होता है, मनुष्य के रूप मे पुनर्जन्म मिलना बहुत ही कठिन होता है।

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल मिलाकर सोलह संस्कार होते हैं, इनमें से मृत्यु आखिरी यानि सोलहवां संस्कार होता है,मृत्यु संस्कार में मृतक की अंतिम विदाई होती है,दाह संस्कार और आत्मा की शांति के लिए कई रीति-रिवाज तथा नियम बनाये जाते है,शास्त्रों में भी अंतिम संस्कार के नियमों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है,माना जाता है कि जिन व्यक्तियों की मृत्यु के बाद विधि-विधान से अंतिम संस्कार नहीं किया जाता उनकी आत्मा प्रेत की तरह चारो ओर भटकती रहती है और उन्हें कई तरह का कष्ट झेलना पड़ता है,इसलिए मृतक़ का अंतिम संस्कार विधि -विधान के साथ करना चाहिए ताकि उन्हें मोक्ष प्राप्ति हो यानि उनकी आत्मा क़ो शांति मिले।

यहाँ पर पूछा गया है कि हिंदू धर्म के अनुसार पिता की चिता को बड़ा पुत्र ही अग्नि क्यों देता है?
यदि हिन्दू धर्म के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद उसकी चिता क़ो अग्नि पुत्री देती है, यह शास्त्रों के अनुसार अनुचित माना जाता है। किसी कन्या या महिला को चिता क़ो अग्नि देने या शमशान घाट में जाने का भी अधिकार नहीं दिया जाता है,क्योकि शास्त्रों के अनुसार यदि पिता की चिता क़ो अग्नि उसकी बेटी देती है तो उसके पिता की आत्मा क़ो शांति नहीं मिलती है यानि स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है, उनकी आत्मा भटकती रहती है।

हिदु धर्म के अनुसार चाहे माता हो या पिता की चिता क़ो बड़ा पुत्र ही अग्नि ही देता है,इस संबंध में हमारे शास्त्रों का कहना है कि पुत्र पु नामक नर्क से बचाता है अर्थात् पुत्र के हाथों से पिता की चिता क़ो अग्नि मिलती है तो पिता क़ो स्वर्ग प्राप्त होता है। इसी मान्यता के आनुसार पुत्र होना कई जन्मों के लिए पुण्यों का फल मिलता है।
क्योकि बड़ा पुत्र माता-पिता का अंश होता है। इसी वजह से बड़े पुत्र का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी चिता क़ो अग्नि देकर पुत्र होने का ऋण अदा कर सके।

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S
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Updated on03/17/26
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हमारे हिंदू शास्त्र के अनुसार पिता को अग्नि केवल बड़े पुत्र या छोटे पुत्र के द्वारा ही दी जाती है। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब बड़ा बेटा अपने पिता को अग्नि देता है तो उसकी आत्मा को शांति मिलती है और वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। अगर उनका बड़ा बेटा किसी कारण बस उनको अग्नि देने नहीं आ सकता है तब छोटा बेटा भी उनको अग्नि दे सकता है।Article image

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preeti  patel
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Answered on10/11/22
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क्या आप जानते हैं कि हमारे हिंदू धर्म में ऐसा भी होता है कि जब किसी पिता की मृत्यु हो जाती है तो उसके चिता को अग्नि केवल उसका बड़ा पुत्र ही देता है आखिर ऐसा क्यों होता है क्या आपने कभी सोचा है चलिए हम आपको बताते हैं कहा जाता है कि कई सारे जन्मों के पुण्य कमाने के बाद ही पुत्र की प्राप्ति होती है। इसलिए पिता की आत्मा को शांति मिले, और उन्हें नर्क पर ना जाना पड़े इसलिए पिता की अग्नि केवल बड़े पुत्र को ही दी जाती है ऐसा करने से पिता की आत्मा को स्वर्ग प्राप्त होता है।Article image

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Krishna Patel
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Answered on10/11/22
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सच तो यह है कि इस दुनिया मे हमने जन्म लिया है लेकिन एक दिन हमारी मृत्यु निश्चित है। हिन्दू धर्म मे मृत्यु से सबंधित बहुत से नियम बनाये गये है जैसे कि किसी की मृत्यु हो जाने पर समसान घाट मे लड़कियां, औरते नहीं जा सकती है और वही दूसरी ओर चिता कों अग्नि औरते नहीं दे सकती है सिर्फ लड़का ही चिता कों अग्नि दे सकता है। हिन्दू धर्म के अनुसार मृत्यु से संबंधित एक रहस्य यह भी है कि चिता कों अग्नि सिर्फ घर का बड़ा बेटा ही दे सकता है ऐसा इसलिए होता है जिस व्यक्ति की मृत्यु हुयी है वह नरक मे ना जाए उसको यदि उसका बड़ा बेटा अग्नि देता है तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।Article image

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S
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Mp

Answered on10/09/22
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यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता है, जो प्राचीन समय से चली आ रही है। इस परंपरा के अनुसार बड़ा बेटा परिवार का मुख्य उत्तराधिकारी माना जाता है। इसलिए अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी उसी पर होती है। इसे अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।Antyeshti में मुखाग्नि देना आत्मा की शांति और मोक्ष से जुड़ा माना जाता है। परंतु आज के समय में अगर बड़ा बेटा मौजूद न हो, तो परिवार का कोई अन्य सदस्य भी यह संस्कार कर सकता है। इस प्रकार यह परंपरा कर्तव्य, सम्मान और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी हुई मानी जाती है।

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M
Madhav SharmaDecoding the ancient language of the stars — with six years of practice, study, and thousands of consultations behind every word.
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Madhav Sharma is a professional astrologer with over 6 years of practice in Vedic astrology. He holds a Jyotish Visharad certification from the Indian Council of Astrological Sciences (ICAS), New Delhi — one of India's most recognised credentials in the field — and has studied under senior practitioners with decades of lineage in classical Vedic traditions. His content covers Vedic astrology, birth chart analysis, planetary transits, kundli matching, horoscope predictions, and the practical application of astrological principles in daily life. His work has been published on platforms including AstroSage, GaneshaSpeaks, and Boldsky Astrology, where he writes for readers seeking guidance grounded in classical astrological texts and consistent interpretive practice. Over six years, Madhav has conducted 2,000+ individual consultations and published 200+ articles on astrology, covering everything from beginner guides to in-depth analyses of rare planetary combinations. He is a practising member of the Indian Astrology Federation and has been a featured voice at astrology conferences and spiritual wellness events across India. Across all his writing, his approach remains consistent — classical knowledge, disciplined interpretation, and content that respects both the tradition of Vedic astrology and the intelligence of the reader.

Answered on03/17/26
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