यह प्रश्न सुनने में दो ख़तरों की प्रतियोगिता जैसा लगता है, पर असल में यह दो अलग तरह की चोटों की तुलना है। आतंकवाद तेज़ और दिखाई देने वाला प्रहार है, जबकि भ्रष्टाचार धीमा और अक्सर अदृश्य घुन है, और दोनों देश की नींव को कमज़ोर करते हैं। इसलिए उत्तर यह है कि दोनों अलग-अलग ढंग से ख़तरनाक हैं और एक की उपेक्षा दूसरे को ताक़त देती है।
आतंकवाद का स्वरूप
आतंकवाद सीधे निर्दोष लोगों की जान लेता है और समाज में भय फैलाता है। मुंबई जैसे हमलों के बाद देश ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, यानी एनआईए, का गठन 2008 के कानून से किया।
भ्रष्टाचार का स्वरूप
भ्रष्टाचार जनता के पैसे को सही जगह पहुँचने से रोकता है। सड़क, अस्पताल, राशन और शिक्षा जैसी सेवाएँ इससे कमज़ोर पड़ती हैं, और आम नागरिक का सरकार तथा संस्थाओं पर भरोसा घटता है। इसकी हानि किसी एक दिन की ख़बर नहीं बनती, पर पीढ़ियों तक विकास की रफ़्तार को धीमा कर सकती है।
दोनों में अंतर
आतंकवाद में हानि अचानक और प्रत्यक्ष होती है, जबकि भ्रष्टाचार में क्रमिक और परोक्ष।
आतंकवाद के विरुद्ध सेना और सुरक्षा बल मोर्चे पर होते हैं, जबकि भ्रष्टाचार से लड़ाई में कानून, पारदर्शिता और नागरिक सतर्कता की भूमिका बड़ी है।
आतंकवाद के प्रति समाज एकजुट दिखता है, पर भ्रष्टाचार के प्रति अक्सर उदासीनता मिलती है।
दोनों कैसे जुड़ते हैं
भ्रष्टाचार आतंकवाद का रास्ता आसान कर सकता है। सीमा चौकियों, पहचान पत्रों या हथियारों की तस्करी में ढील और रिश्वत से सुरक्षा व्यवस्था की दीवार कमज़ोर होती है। इसी तरह आतंकी संगठनों को धन पहुँचाने वाले अवैध नेटवर्क अक्सर भ्रष्ट तरीकों पर निर्भर रहते हैं, इसलिए दोनों समस्याएँ एक-दूसरे को पोषण देती हैं।
किस पर अधिक ध्यान दें
जो लोग आतंकवाद को बड़ा ख़तरा कहते हैं, वे जान के तुरंत नुकसान को आधार बनाते हैं। जो भ्रष्टाचार को बड़ा बताते हैं, वे कहते हैं कि यह रोज़ करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है और संस्थाओं को भीतर से खोखला कर देता है। दोनों तर्कों में दम है, और कौन अधिक ख़तरनाक है, यह इस पर निर्भर करता है कि हम तात्कालिक क्षति को अधिक महत्व दें या दीर्घकालिक असर को।
भारत के उपाय
भ्रष्टाचार रोकने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988, सूचना का अधिकार कानून 2005 और लोकपाल तथा लोकायुक्त अधिनियम 2013 जैसे प्रावधान बने हैं। आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों, ख़ुफ़िया तंत्र और विशेष कानूनों का सहारा लिया जाता है। इन उपायों की प्रभावशीलता और उनके दुरुपयोग पर बहस भी होती रही है।

