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May 31, 2020astrology

क्या भगवान का भी अभिमान भक्त तोड़ देते है अपने भक्ति से ?

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3 Answers

K
Oct 23, 2025

जी हां कभी कभी भगवन का भी अभिमान भक्त अपने भक्ति से तोड़ देते है इसको जानने की लिए कैसे कोई भक्त कैसे अपने इष्ट देव का अभिमान तोड़ सकता है उसके बारे में बताते है और कौन वो भक्त था जिसने तोडा था अपने भगवन श्री वीष्णु जी का अभिमान

क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं, विष्णुजी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं।

क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार करने लगा कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा, यह सोच कर उनकी ओर बढ़ा।उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग ने देख लिये और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा, फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया, कुछ समय पश्चात् जब शेषजी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया । इस बार लक्ष्मीदेवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया।

इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष नाग और लक्ष्मी माता के कारण उसे सफलता नहीं मिली, यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया।इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा, अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लिया था।

कछुवे को पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का और वही शेषनाग लक्ष्मण का व वही लक्ष्मीदेवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़ेगी । इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था।एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे, इसीलिये उसने रामजी से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ, संत श्री तुलसीदासजी भी इस तथ्य को जानते थे, इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि

#कहहितुम्हारमरमुमैंजाना__

केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था । उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था।अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं, पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं।

इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसीदासजी ने लिखा है -

( हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता, हे राम मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ, भले ही लक्ष्मणजी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ, हे कृपालु मैं पार नहीं उतारूँगा।

#तुलसीदासजी आगे और लिखते हैं -

केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्रजी जानकी और लक्ष्मण की ओर देख कर हँसे । जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं- कहो, अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है।

केवट बहुत चतुर था, उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया, तुलसीदासजी लिखते हैं -.

चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया। उस समय का प्रसंग है जब केवट भगवान् के चरण धो रहे है।बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान् का एक पैर धोकर उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देते है, और जब दूसरा धोने लगते है, तो पहला वाला पैर गीला होने से जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है,

केवट दूसरा पैर बाहर रखते है, फिर पहले वाले को धोते है, एक-एक पैर को सात-सात बार धोते है, फिर ये सब देखकर कहते है, प्रभु, एक पैर कठौती में रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो।

जब भगवान् ऐसा ही करते है । तो जरा सोचिये, क्या स्थिति होगी, यदि एक पैर कठौती में है और दूसरा केवट के हाथों में, भगवान् दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले - केवट मैं गिर जाऊँगा।

केवट बोला - चिंता क्यों करते हो भगवन्, दोनों हाथों को मेरे सिर पर रख कर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेंगे, जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है, भगवान् भी आज वैसे ही खड़े है।

भगवान् केवट से बोले - भईया केवट ! मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया, केवट बोला - प्रभु क्या कह रहे है??

भगवान् बोले - सच कह रहा हूँ केवट अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि मैं भक्तों को गिरने से बचाता हूँ पर आज पता चला कि भक्त भी भगवान् को गिरने से बचाता है।

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M
Jun 5, 2020
अहंकार किसी के लिए भी अच्‍छा नहीं होता। फिर चाहे वह भगवान का भक्‍त हो या नहीं। लेकिन अगर कोई भक्‍त होकर भी अहंकार करे तो ईश्‍वर जल्‍द से जल्‍द उसका अभिमान चूर-चूर कर देते हैं। ताकि वह अहंकार के भाव से रहित होकर निर्मल भक्ति कर सके। ग्रंथ और पुराणों में भी इस बात का उल्‍लेख मिलता है कि भक्ति में कभी भी अभिमान की भावना नहीं होनी चाहिए। अन्‍यथा भक्ति का फल नहीं मिलता। ऐसे ही दो महान भक्‍त हुए, जिनका जिक्र कई ग्रंथों में मिलता है। यही नहीं आज भी उन्‍हें ही ईश्‍वर का सर्वश्रेष्‍ठ भक्‍त माना जाता है। लेकिन एक वक्‍त था जब उन्‍हें भी परम भक्‍त होने का गुमान हुआ। हालांकि प्रभु ने भक्‍त को इस विकृति से बचाने में तनिक भी देर नहीं की। इस कहानी में उसी बात का जिक्र कर रहे हैं कि कौन थे वे भक्‍त और प्रभु ने कैसे तोड़ा उनका अभिमान?
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Awni rai
Jun 5, 2020
बहुत सारे भक्तो ने भगवान का अभिमान तोडा है जैसे प्रह्लाद ,केवट ,और बहुत सारे ऐसे भक्त है
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