हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है लेकिन यह बहुत बड़ा सवाल है क्या सच में महिलाओं को इस दिन को मनाने की जरुरत पड़ती है | मुझे नहीं लगता की महिलाओं की किसी भी सोच को प्रेरित करने के लिए हमें इस ख़ास दिन पर उनको जाताना होगा की वह एक महिला है और सबके लिए ख़ास है |
महिला दिवस एक ऐसा दिन है जब सभी महिलाओं को बताया जाता है वह सबके जीवन में बहुत ख़ास और जरुरी है,वही दूसरी तरफ यह बात मुझे बहुत परेशान कर देती है की हर साल भारत जैसे देशों में करीब 800 बेटियां दहेज़ हत्या का शिकार बनती है, सालाना 2000 मासूम बच्चियों को पैदा होने से पहले ही कोख में मार दिया जाता है, यह सब सच जानने के बाद मुझे नहीं लगता की महिलाओं को महिला दिवस मनाने की जरुरत पड़ती है |
आज भी कई ऐसे शहर और गाँव है जहाँ महिलाओं को लेकर पुरषों की सोच रूढ़िवादी है जहाँ आज भी महिलाओं और पुरषों को एक समान नहीं बल्कि महिलाओं को पुरषों से कम समझा जाता है, जहाँ आज भी यह सोच घर कर के बैठी है कि एक लड़की पढ़ लिख कर क्या करेगी कुल का नाम तो घर का चिराग घर का बेटा रोशन करता है |
हमारे समाज में महिला और पुरषों के बीच यह अंतर महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकता है और उनके क़दमों को बेड़ियों में जकड़ कर समाज के किसी कोने में मात्र कचरे सा फेक देता है |
