K
kisan thakur· 6 साल पहले
लेखक

ये है कौन साई बाबा या चाँद मिया ?

1
6.1K

इस बातचीत में शामिल हों

क्रमबद्ध करें
ऊपर दिए गए सवाल का जवाब
जवाब दिया गया10/15/26

शिरडी के साईं बाबा कौन थे और क्या उनका असली नाम चाँद मियाँ था? यह सवाल समय-समय पर चर्चा में आता है। साईं बाबा भारत के प्रसिद्ध संतों में से एक थे, जिन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग श्रद्धा से मानते हैं। उनके जन्म, परिवार, शुरुआती जीवन और मूल नाम के बारे में ऐतिहासिक जानकारी सीमित है। शिरडी साईं बाबा संस्थान के अनुसार, उनके जन्म और मूल नाम के बारे में कोई निर्णायक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

लेख की तस्वीर

1. शिरडी के साईं बाबा कौन थे?

शिरडी के साईं बाबा उन्नीसवीं सदी में महाराष्ट्र के शिरडी गांव में रहने वाले एक आध्यात्मिक संत थे। वे अपने जीवन का अधिकांश समय शिरडी में रहे और वर्ष 1918 में उन्होंने महासमाधि ली।

उनकी शिक्षाओं में प्रेम, दया, सेवा, धैर्य और धार्मिक सद्भाव को विशेष महत्व दिया जाता है। उनके अनुयायी अलग-अलग धर्मों और समुदायों से आते हैं। साईं बाबा से जुड़ी परंपराओं में मानवता और आपसी सम्मान का संदेश प्रमुख है।

2. क्या साईं बाबा का असली नाम चाँद मियाँ था?

साईं बाबा के मूल नाम को लेकर कई दावे और चर्चाएं मिलती हैं। कुछ लेखों और ऑनलाइन चर्चाओं में उन्हें ‘चाँद मियाँ’ नाम से जोड़ा जाता है। हालांकि, इस नाम को उनका वास्तविक जन्मनाम साबित करने वाला विश्वसनीय ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है।

ऑक्सफोर्ड अकादमिक में प्रकाशित साईं बाबा से संबंधित शोध-संदर्भ के अनुसार, उनके जन्मस्थान, जन्म के समय के नाम और शुरुआती जीवन के बारे में ऐतिहासिक रूप से निश्चित जानकारी बहुत कम है। इसलिए किसी अप्रमाणित दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं है।

3. उन्हें ‘साईं बाबा’ नाम कैसे मिला?

शिरडी साईं बाबा संस्थान के आधिकारिक विवरण के अनुसार, जब वे एक युवा फकीर के रूप में शिरडी पहुंचे, तब खंडोबा मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने उनका स्वागत करते हुए उन्हें ‘आओ साईं’ कहा। इसके बाद वे साईं बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

‘साईं’ शब्द धार्मिक संत या फकीर के लिए सम्मानसूचक रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि ‘बाबा’ का अर्थ पिता, बुजुर्ग या सम्मानित व्यक्ति के रूप में लिया जाता है। इस प्रकार, साईं बाबा नाम उनकी आध्यात्मिक पहचान से जुड़ गया।

4. साईं बाबा किस धर्म से जुड़े थे?

साईं बाबा के धार्मिक परिचय को लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। उनके जीवन में हिंदू और इस्लामी परंपराओं से जुड़े कई तत्व दिखाई देते हैं। वे मस्जिद में रहते थे, जिसे बाद में द्वारकामाई कहा जाने लगा, और उनके भक्त विभिन्न धर्मों से आते थे।

उनकी शिक्षाओं में धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता, प्रेम और ईश्वर में विश्वास रखने पर जोर दिया जाता है। उनके जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में निर्णायक प्रमाण न होने के कारण उनके धार्मिक मूल के बारे में निश्चित दावा करना कठिन है।

5. साईं बाबा की प्रमुख शिक्षाएं क्या थीं?

साईं बाबा की शिक्षाओं को उनके भक्त जीवन में अपनाने योग्य मानते हैं। उनकी परंपरा में कुछ विचार विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं:

  • श्रद्धा: विश्वास और आस्था बनाए रखना।

  • सबूरी: धैर्य और संयम के साथ जीवन की परिस्थितियों का सामना करना।

  • मानवता: जरूरतमंदों की सहायता करना और दूसरों के प्रति दया रखना।

  • धार्मिक सद्भाव: अलग-अलग धर्मों के लोगों का सम्मान करना।

  • सेवा: दूसरों की मदद को महत्वपूर्ण मानना।

इन शिक्षाओं के कारण साईं बाबा आज भी लाखों लोगों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं।

6. साईं बाबा के बारे में सही जानकारी कैसे समझें?

साईं बाबा के जीवन से जुड़ी जानकारी को समझते समय धार्मिक परंपराओं, भक्तों द्वारा लिखी गई जीवनियों और ऐतिहासिक शोध के बीच अंतर करना जरूरी है।

उनके जीवन के बारे में कई कथाएं भक्तों की पुस्तकों और मौखिक परंपराओं में मिलती हैं। ये कथाएं धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन हर विवरण को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

इस विषय पर जानकारी के लिए शिरडी साईं बाबा संस्थान के आधिकारिक विवरण और अकादमिक शोध को देखना उपयोगी है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उनके मूल नाम या जन्म की पहचान के बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

निष्कर्ष

शिरडी के साईं बाबा एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत थे, जिनकी शिक्षाओं ने विभिन्न धर्मों के लोगों को प्रभावित किया। उनके मूल नाम, जन्मस्थान और शुरुआती जीवन को लेकर कई दावे प्रचलित हैं, लेकिन ‘चाँद मियाँ’ उनका असली नाम था, इसकी निर्णायक ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

इसलिए इस सवाल का सबसे तथ्यपरक जवाब यही है कि साईं बाबा की मूल पहचान के बारे में पूरी तरह प्रमाणित जानकारी नहीं है। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी शिक्षाएं, मानवता के प्रति उनका संदेश और विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव की उनकी परंपरा है।

यह भी पढ़ें: नयी कार लेते समय किन बातो का ध्यान रखना चाहिए?

H
Six years of research-backed expertise — making well-sourced, reliable content that readers and platforms can depend on.
प्रोफ़ाइल देखें

Himani Sharma is a subject matter expert and content writer with over 6 years of experience covering travel, government schemes, and personal development across digital platforms in India. She holds a Master's degree in Social Sciences from Banaras Hindu University (BHU), an academic background that informs the research depth and analytical approach she brings to every topic she covers. Her content spans domestic and international travel guides, breakdowns of central and state government welfare schemes, and practical personal development resources for Indian readers navigating career, finance, and everyday life decisions. Her work has appeared on platforms including Nativeplanet, Sarkari Result Blog, and UrbanClap Stories, where she has built a reputation for content that is thoroughly researched, clearly structured, and genuinely useful. Over six years, Himani has published 200+ articles across her subject areas, developing a methodical content approach — verified sources, evidence-based arguments, and writing that serves the reader's actual information need rather than just ranking for keywords. Her subject matter grounding gives her a consistent edge in producing content that holds up to professional scrutiny across three distinct but equally research-intensive categories. Across all her writing, her standard remains the same — research first, clarity always, and content that serves the reader rather than just filling a page.

0
ऊपर दिए गए सवाल का जवाब
जवाब दिया गया02/23/20


साईं का जन्म 1838 में हुआ था, पर कैसे हुआ और उसके बाद की पूरी कथा बहुत ही रोचक है, साईं के पिता का असली नाम था बहरुद्दीन, जो कि अफगानिस्तान का एक पिंडारी था, वैसे इस पर एक फिल्म भी आई थी जिसमे पिंडारियो को देशभक्त बताया गया है, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी ने मोपला और नो आखली में हिन्दुओ के हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी कहा था.औरंगजेब की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य ख़तम सा हो गया था केवल दिल्ली उनके अधीन थी, मराठा के वीर सपूतो ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नीव रख ही दी थी, ऐसे समय में मराठाओ को बदनाम करके उनके इलाको में लूटपाट करने का काम ये पिंडारी करते थे, इनका एक ही काम था लूटपाट करके जो औरत मिलती उसका बलात्कार करना, आज एक का बलात्कार कल दूसरी का, इस तरह से ये मराठाओ को तंग किया करते थे, पर समय के साथ साथ देश में अंग्रेज आये और उन्होंने इन पिंडारियो को मार मार कर ख़तम करना शुरू किया.साईं का बाप जो एक पिंडारी ही था, उसका मुख्यकाम था अफगानिस्तान से भारत के राज्यों में लूटपाट करना, एक बार लूटपाट करते करते वह महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुचा, जहा वह एक वेश्या के घर रुक गया, उम्र भी जवाब दे रही थी, सो वो उसी के पास रहने लग गया, कुछ समय बाद उस वेश्या से उसे एक लड़का और एक लड़की पैदा हुआ, लड़के का नाम उसने चाँद मियां रखा और उसे लेकर लूटपाट करना सिखाने के लिए उसे अफगानिस्तान ले गया.उस समय अंग्रेज पिंडारियो की ज़बरदस्त धर पकड़ कर रहे थे, इसलिए बहरुद्दीन भेष बदल कर लूटपाट करता था. उसने अपने सन्देश वाहक के लिए चाँद मिया को रख लिया, चाँद मिया आज कल के उन मुसलमान भिखारियों की तरह था जो चादर फैला कर भीख मांगते थे, जिन्हें अँगरेज़ Blanket Begger कहते थे, चाँद मिया का काम था लूट के लिए सही वक़्त देखना और सन्देश अपने बाप को देना, वह उस सन्देश को लिख कर उसे चादर के नीचे सिल कर हैदराबाद से अफगानिस्तान तक ले जाता था, पर एक दिन ये चाँद मियां अग्रेजो के हत्थे लग गया और उसे पकडवाने में झाँसी के लोगो ने अंग्रेजो की मदद की जो अपने इलाके में हो रही लूटपाट से तंग थे.उसी समय देश में पहली आजादी की क्रांति हुई और पूरा देश क्रांति से गूंज उठा, अंग्रेजो के लिए विकट समय था और इसके लिए उन्हें खूंखार लोगो की जरुरत थी, बहर्दुद्दीन तो था ही धन का लालची, सो उसने अंग्रेजो से हाथ मिला लिया और झाँसी चला गया. उसने लोगो से घुलमिल कर झाँसी के किले में प्रवेश किया और समय आने पर पीछे से दरवाजा खोल कर रानी लक्ष्मी बाई को हराने में अहम् भूमिका अदा की, यही चाँद मिया आठ साल बाद जेल से छुटकर कुछ दिन बाद शिर्डी पंहुचा और वहके सुलेमानी लोगो से मिला जिनका असली काम था गैर-मुसलमानों के बीच रह कर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना.चाँद मियां ने वही से अलतकिया का ज्ञान लिया और हिन्दुओ को फ़साने के लिए साईं नाम रख कर शिर्डी में आसन जमा कर बैठ गया, मस्जिद को जानबूझ कर एक हिन्दू नाम दिया और उसके वहा ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया, एक षड्यंत्र के तहत साईं को भगवान का रूप दिखाया गया और पीछे से ही हिन्दू मुस्लिम एकता की बाते करके स्वाभिमानी मराठाओ को मुर्दा बनाने के लिए उन्हें उनके ही असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढाया गया. पर पीछे ही पीछे साईं काअसली मकसद था लोगो में इस्लाम को बढ़ाना, इसका एक उदाहरण साईं सत्चरित्र में है कि साईं के पास एक पुलिस वाला आता है जिसे साईं मार मार भगाने की बात कहता है, अब असल में हुआ ये की एक पंडित जी ने अपने पुत्र को शिक्षा दिलवाने के लिए साईं को सोंप दिया, पर साईं ने उसका खतना कर दिया. जब पंडितजी को पता चला तो उन्होंने कोतवाली में रिपोर्ट कर दी, साईं को पकड़ने के लिए एक पुलिस वाला भी आया जिसे साईं ने मार कर भगाने की बात कही थी, ये तभी की फोटो है जब पुलिस वाला साईं को पकड़ने गया था और साईं बुरका पहन कर भागा था.मेरी साई बाबा से कोई निजी दुस्मनी नही है, परतुं हिन्दू धर्म को नाश होरहा है, इसलिए मै कुछ सवाल करना चाहता हूँ. हिन्दू धर्म एक सनातन धर्म है, लेकिन आज कल लोग इस बात से परिचित नही है क्या? जब भारत मे अंग्रेजी सरकार अत्याचार और सबको मौत के घाट उतार रहे थे तब साई बाबा ने कौन से ब्रिटिश अंग्रेजो के साथ आंदोलन किया ? जिदंगी भीख मांगने मे कट गई? मस्जिदमे रह कर कुरान पढना जरूरी था. बकरे हलाल करना क्या जरूरी था ? सब पाखंड है, लोगो को मुर्ख बना कर पैसा कमाने का जरिया है। ऐसा कौन सा दुख है कि उसे भगवान दूर नही कर सकते है.श्रीमद भगवत गीता मे लिखा है कि श्मशान और समाधि की पुजा करने वाले मनुष्य राक्षस योनी को प्राप्त होते हैं.साई जैसे पाखंडी की आज इतनी ज्यादा सेल्स मार्केटिंग हो गयी है कि हमारे हिन्दू भाई बहिन आज अपने मूल धर्म से अलग होकर साई मुल्ले कि पूजा करने लगे है। आज लगभग हर मंदिर में इस जिहादी ने कब्जा कर लिया है।हनुमान जी ने हमेशा सीता राम कहा और आज के मूर्ख हिन्दू हुनमान जी का अपमान करते हुए सीता राम कि जगह साई राम कहने लग गए । बड़ी शर्म कि बात है। आज जिसकी मार्केटिंग ज्यादा उसी कि पूजा हो रही है। इसी लिए कृष्ण भगवान ने कहा था कि कलयुग में इंसान पथ और धर्म दोनों से भ्रष्ट हो जाएगा।100 मे से 99 को नहीं पता साई कौन था, इसने कौन सी किताब लिखी, क्या उपदेश दिये पर फिर भी भगवान बनाकर बैठे है ! साई के माँ बाप का सही सही पता नहीं ,पर मूर्खो को ये पता है कि ये किस किस के अवतार है ! अंग्रेज़ो के जमाने मे मूर्खो के साई भगवान पैदा होकर मर गए पर किसी भी एक महामारी भुखमरी मे मदद नहीं की। इनके रहते भारत गुलाम बना रहा पर इन महाशय को कोई खबर नहीं रही। शिर्डी से कभी बाहर नहीं निकले पर पूरे देश मे अचानक इनकी मौत के 90-100 साल बाद इनके मंदिर कुकुरमुत्ते की तरह बनने लगे।चालीसा हनुमान जी की हुआ करती थी, आज साई की हो गयी ! राम सीता के हुआ करते थे,आज साई ही राम हो गए ! श्याम राधा के थे, आज वो भी साई बना दिये गए ! बृहस्पति दिन विष्णु भगवान का होता था, आज साई का मनाया जाने लगा!भगवान की मूर्ति मंदिरो में छोटी हो गयी और साई विशाल मूर्ति मे हो गए ! प्राचीन हनुमान मंदिर दान को तरस गए और साई मंदिरो के तहखाने तक भर गए!मूर्ख हिन्दुओ अगर दुनिया मे सच मे कलयुग के बाद भगवान ने इंसाफ किया तो याद रखना मुह छुपाने के लिए और अपनी मूर्ख बुद्धि पर तरस खाने के लिए कही शरण भी न मिलेगी ! इसलिए भागवानो की तुलना मुल्ले साई से करके पाप मत करो।इस लेख को पढ़ने के बाद भीन समझ मे आए तो अपना खतना करवा के मुसलमान बन जाओ! क्या करोगे शेयर करके...*-------------->>>साईं की मृत्यु के बाद --दशकों तक सांई का कहीं कोई नाम लेवा नहीं था। हो सकता है कि मात्र थोड़ी दूर तक के लोग जानते होंगे। पर अब कुछ तीस या चालीस वर्षों में उनकी उपस्थिति आम हो गई है और लोगों की आस्था का पारा अचानक से उबाल करने लगा है।अच्छा मैं एक बात पूछता हूँ... आप किसी भी साठ या सत्तर साल के व्यक्ति से पूछ लें कि वे साईं बाबा का नाम पहली बार अपने जीवन में कब सुना था..?.. निश्चित ही वो कहेगा कि वो पहले नहीं सुना था... कोई नब्बे या कोई अस्सीे के दशक में हीं सुना हुआ कहेगा।इत्ती जल्दी ये इत्ता बड़ा भगवान कैसे बन गया ?एक बात और... हिन्दुओं के भगवान बनाने के पहले इनके चेले चपाटों ने इन्हें कुछ इस प्रकार से पेश किया था जैसे कि सभी धर्मों के यही एक मात्र नियंता हों। हिन्दू , मुस्लिम, सिक्ख ईसाई... सभी के इष्ट यही थे।और इन्हें पेश किया कौन?.. जरा ये भी समझिए... सत्तर - अस्सी के दशक में जो फिल्में बनती थी या गाने होते थे उसमें या तो हिन्दूओं के भगवान या फिर मुस्लिमों के अल्लाह का जिक्र होता था। भगवान वाला सीन मुस्लिमों को स्वीकार नहीं थाऔर अल्लाह वाला हिन्दूओं को। पर नायक को अलौकिक शक्ति देने के लिए इनका सीन डालना भी जरूरी ही था।..किया क्या जाय?... तो....यह किसी निर्देशक की सोच रही होगी कि..* *किसी ऐसे व्यक्ति को अलौकिक शक्ति से लैस करके दिखाया जाय ताकि किसी भी धर्म के लोगो का विरोध ना झेलनी पड़े और वे अपनी फिल्म को सफल बना लें। ऐसा ही कुछ उनके दिमाग में आया होगा... और अचानक से उनके दिमाग की बत्ती जल गई होगी जब किसी ने साईं का नाम सुझाया होगा।*

*Eurekkka.... Eurekkka कहते हुए वे उछल पड़े होंगे। इस नये भगवान का सफल परीक्षण उस ऐतिहासिक दिन को किया गया जो साईं भक्तों के लिए एक पवित्र दिन से कम नहीं है। 7 जनवरी 1977 को रूपहले पर्दे पर एक फिल्म आई* *""अमर अकबर एंथोनी""इस फिल्म में एक गाना बजा "शिर्डी वाले साई बाबा आया हूँ तेरे दर पे सवाली"?? बस क्या था.. संयोगवश फिल्म भी हिट... बाबा भी हिट....। साई बाबा के चेले चपाटों के पैर अब तो जमीन पर पड़ ही नहीं रहे थे साई की स्वीकार्यता को देखकर। उससे पहले तक ना कहीं तस्वीर, ना कहीं मुर्ति और ना ही कोई चर्चा और उसके बाद तो हर जगह साई ही साई। फोटोशॉप करके आग से भी निकाले गए साई, जो कई भक्तों के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। धीरे धीरे, चुपके चुपके हिन्दुओं के मंदिरों में मुर्तियां बैठने लगी... इनके अपने मंदिर भी बनने लगे। एक और मजे की बात कि किसी अन्य धर्मों एवं स्वम् साई के इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम धर्म के लोगों ने ही आजतक इन्हें स्वीकार किया ही नहीं सिवाय हिन्दुओं के। अब देखिए, हमारा सनातनी हिन्दू समाज अब धीरे धीरे उस मोड़ पर जा रहा है जहाँ से दो धड़े साफ साफ दिखेंगे... एक विधर्मी साईं को मानने वाले हिन्दू और दूसरे अपने सनातनी मार्ग पर चलने वाले हिन्दू।* *इनमें अब दूरियां बढ़ती जाएंगी और आने वाले समय में इस समाज में दो फाड़ होगा। एक "सनातनी हिन्दू" और दूसरा "साईं पूजक हिन्दू"। सनातनी वाले साईं को मान्यता नहीं देंगे और साईं वाले साईं भक्ति नहीं छोड़ेंगे। बात और आगे जाएगी... ये दोनो एक दूसरे के मंदिरों में जाना बंद कर देंगे.... यदि नहीं तो फिर सनातनी उन्हें अपने मंदिरों में आने से रोकेंगे। कोई हार मानने को तैयार नहीं होगा। और यही वो समय होगा जब हिन्दू समाज दो खेमे में बँट जायेगा। बिल्कुल उसी तरह जैसे...मुस्लिम बंटकर शिया - सुन्नी हुए....ईसाई बंटकर कैथोलिक प्रोटेस्टेन्ट हुए.....जैन बंटे तो श्वेतांबर - दिगम्बर हुए.....बौद्ध बंटे तो हीनयान - महायान हुए। हो सकता है ये सुनकर आपको अचम्भा लगे पर हिन्दू धर्म में पड़ रही यही दरार ही विभाजन का कारण बनेगी। "मेरा यह मानना है कि साईं बाबा को एक षडयंत्र की तरह हमारे बीच रोपा गया है और मैं प्राण प्रण से इसका विरोध करता रहूँगा। "शिरडी में सांई की कब्र यानि मजार पर मन्दिर बना दिया। "ना मैं पूर्वाग्रही हूँ.. ना ही दुराग्रही हूँ....और ना ही किसी से चिढ़ है। एक सनातनी हिन्दू होने के नाते अपने धर्म को दूषित और विभाजित होते नहीं देख सकता हूँ। ""इसके गुनाहगार वे लोग भी होंगे जो सिर्फ़ तमाशा देख रहे हैं और आवाज नहीं उठा रहे हैं।*

*सत्य सनातन धर्म की जय । जय श्री राम*

*जिसको भी इस पोस्ट की प्रमाणिकता पर शक हो तो वह पहले शिर्डी साई संस्थान में मिल रही पुस्तक साई सचित्र को पढ़ ले*





K
लेखक
प्रोफ़ाइल देखें
1