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Vansh Chopra

System Engineer IBM | पोस्ट किया |


क्या फिर बदलेगी बिहार की राजनीति, क्या चाहते हैं नितीश?


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Optician | पोस्ट किया


बिहार की राजनीति कब किस करवट मुड़ेगी यह अंदाजा शायद ही कोई कभी सटीक लगा सका हो। इसे राजनीति का रिसर्च सेंटर शायद कहते भी इसी वजह से हैं। यहां की राजनीति 2014 लोकसभा चुनावों के समय से खास तौर पर कई बार बड़े बदलाव के दौर से गुजर चुकी है। इसी क्रम में कभी किसी से मिलन तो कभी अलगाव हुआ, कहीं दुश्मन दोस्त बन गलबहियां करते नजर आए तो कहीं बड़े छोटे भाई की बात करने वाले अलग हो गए। अब एक बार फिर 2019 से पहले राजनीति उफान पर है। इतना तय है कि यह आखिरी बार होगा जब बिहार की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। आइये आपको बताएं, बिहार की राजनीति में पक रही खिचड़ी की पूरी कहानी।
बिहार में अचानक नीतीश को ऐसा क्या सुझा की वह लोकसभा चुनाव में एक साल का वक़्त रहते ही सीटों के बंटवारे का राग अलापने लगे? क्यों इतनी अकड़? अब किसका मिलेगा सहारा? यह अति आत्मविश्वास है, चेहरे का गुमान है, विकास की राजनीति पर भरोसा है या बस तोल मोल समय से पहले करना ही वर्तमान राजनीति की मांग है? इन सभी सवालों में ही इसके जवाब भी निहित है। आइये बताएं कैसे लेकिन उससे पहले थोड़ा फ्लैशबैक में लिए चलते हैं। नीतीश ऐसी जिद्द हमेशा समय से पहले ही करते हैं और मनवाने में सफलता भी मिलती रही है। उदाहरण के लिए 2015 विधानसभा चुनाव की ही बात करें तो गठबंधन के एलान से पहले ही उन्होंने खुद को सीएम उम्मीदवार घोषित करा लिया और लालू की मजबूरी कहें या भरोसा वह मां गए थे। बीजेपी के साथ आने के बावजूद नीतीश की कई मांगें केंद्र सरकार और बीजेपी की असहज करती रही हैं। ऐसे में इस बार सीटों के बंटवारे में कुछ नया नही है।
फिलहाल बिहार की राजनीति में अचानक आये इस भूचाल की बात करें तो नीतीश अंतिम समय मे कोई मौका किसी भी वजह से गंवाना नही चाहते यही वजह है कि वह अभी से यह राग अलापने लगे हैं। सीटों का बंटवारा वह जानते हैं विधानसभा के आधार पर बीजेपी नही करना चाहेगी। बीजेपी नीतीश की मांग में कर रालोसपा और एलजेपी जैसे सहयोगी दलों को भी नाराज नही कर सकती न झुक सकती है। मांझी पहले ही पतवार छोड़ गए हैं ऐसे में पासवान का होना बीजेपी के लिए मजबूरी और जरूरी है। ऐसे में कोई नया फार्मूला ही बीजेपी और जदयू को साथ ला सकता है। इसके अलावा नीतीश का यह दांव इस बार उनपर ही भारी पड़ सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर वह समर्थन छोड़ते हैं तो सरकार गिरेगी, वह राजद के साथ जा नही सकते हैं। ऐसे में बीजेपी और नीतीश मजबूर हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा।

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