हम सभी लोग भावनाओ से बने है. हम में इमोशंस है, जज्बात है, भावनाये है और एक कॉमन चीज़ भी है, दिल. ऐसा नहीं है की दुसरो के सामने केवल लड़किया ही रोती है लड़के नहीं. कई बार देखा गया है की लड़के लड़कियों की अपेक्षा जल्दी टूट जाते है और जब वह अपनी भावनाये व्यक्त नहीं कर पते है तो अंदर ही अंदर रो लेते है या अपने जज्बात, दर्द को दबा लेते है पर जब दर्द बर्दाश से बाहर हो जाता है तो जरा भी देर नहीं लगती है आँखे नम होने में .
कुछ लोग मानते है की लड़कियों के आंसू उनकी पलकों में होते है पर दरअसल, सच तो ये है कि, लड़किया भावनात्मक रूप से लड़को से ज्यादा स्ट्रांग होती है इसलिए उन्हें धरा की संज्ञा भी दी जाती है.
लेकिन समाज के द्वारा बनाये गए इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी लड़को का रोना उनकी कमजोरी की निशानी माना जाता है या दोस्तों, अपने के बीच हंसी का कारण बन जाता है. इस कारण भी कई बार लड़के अपनी भावनाये चाह कर भी बता नहीं पाते है.
कई बार घर की स्थिति, छोटो का दर्द, अपनों की जिम्मेदारी, समाज का लिहाज उन्हें अपनी भावनाओ को व्यक्त करने से रोक देता है.
पर कई बार ऐसा भी होता है की पानी के मोती जब तक दिल से होते हुए पलकों तक नहीं आते, लोगो को नहीं दिखते, उन्हें यकीन नहीं होता है.
बस अंतर इतना है..
"कोई बाहर रोता है.. कोई अंदर (दिल में) रोता है..
कोई दर्द से रो देता है.. कोई दर्द देखकर रो देता है "