प्राचीन भारतीय इतिहास के महान शासक चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन का अंत एक खास धार्मिक परंपरा से जुड़ा माना जाता है। माना जाता है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में जैन धर्म अपना लिया था।
वे जैन संत भद्राबाहु के साथ दक्षिण भारत गए थे। वहां उन्होंने सल्लेखना नामक व्रत अपनाया, जिसमें व्यक्ति धीरे-धीरे भोजन और पानी त्यागकर शरीर का त्याग करता है। यह प्रक्रिया जैन धर्म में एक धार्मिक और तपस्या का मार्ग मानी जाती है।
माना जाता है कि उन्होंने इसी व्रत के माध्यम से अपनी मृत्यु को प्राप्त किया। उनका अंत एक आध्यात्मिक और धार्मिक प्रक्रिया के रूप में बताया जाता है, जो उनके जीवन के अंतिम चरण को दर्शाता है।


