ये दशक 2010-2020
मैंने पाया है इस दशक में लोगों ने रिश्ते निभाने छोर दिए है रिश्तों में जब तक सब आसानी से चलता रहे तब तक चलने दो और जब कोई रिश्ता नाज़ुक वक़्त में हो तो उस रिश्ते को मज़बूत करने की कोसिस करने की बजाए आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर चालू हो जाता है
मैंने महसूस किया है इस दशक में लोगों ने रिश्ते निभाने की कला खो दी है इस दौर में रिश्ते से ज्यादा लोग अपने ego अपने अना अपने स्वाभिमान को क़ायम रखना चाहते है रिश्ते से ज्यादा उनका अभिमान बढ़ कर आ जाता है
मैंने आज़माया है की इस दशक में लोगों ने आगे बढ़ कर रिश्ते सम्भालने की जगह कौन ग़लत कौन सही को value देना सीखा है छोटी छोटी बातों में रिश्ते को ख़त्म करने पे आगे बढ़ना सीखा है फिर वो अना की आग में इस कदर जल रहे होते की सामने वाला मर भी रहा होता है ये जानते हुए भी वो अपने अना को क़ायम रखना चाहते है
पर मेरा मानना है कि किसी भी अभिमान स्वाभिमान से बढ़ कर होता है इक रिश्ता इक आख़िरी कोसिस हमेशा करनी चाहिए रिश्तों को निभाने की क्यूँकि ये वही रिश्ते होते है जिनमे आपने अपनी इक ज़िंदगी जी होती है जिनमे आपने संग मिल के कई सपने देखे होते है
तो हमेशा कोसिस करनी चाहिये की स्वयं से कभी आगे आकर अपने साथी को गले लगाकर या हाथ पकड़ कर सिर्फ़ इतना बोल देना भर भी काफ़ी होगा “की किसी भी झगड़े किसी भी दिक़्क़तों से बढ़कर है हमारा रिश्ता मुझे तुम ज़रूरी हो” विस्वास कीजिए इतना भर बोल देने से कोई भी रिश्ते टूटने से बच जायेंगे


