महाभारत हम सभी ने सुनी और देखी है। श्री कृष्ण की लिलाये और उनके अनेको कार्यो को भी देखा है वह कैसे नीतियों के द्वारा अपने शत्रुओ को परास्त कर देते है।उन्ही शत्रुओ मे से एक थाकालयवन ।
कालयवन जन्म से ब्रह्मांड था लेकिन उसके कर्म असुरो वाले थे। वह ऋषि शेशिरायण और अप्सरा रंभा का पुत्र था। शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे।
शिव की तपस्या करके शेशिरायण ने एक अजेय पुत्र की कामना की थी और उन्हे कालयवन की प्राप्ति हुई।वरदान के स्वरूप कालयवन को कोई भी अस्त्र शत्र से नही मारा जा सकता था और ना ही कोई चंद्रवंशी या सूर्यवंशी उनको परास्त कर सकता था।
कालयवन ने श्री कृष्ण को हराने के लिए मथुरा मे युध्य का संदेश दिया। श्री कृष्ण ने भी संदेश में केवल उन्हे और श्री कृष्ण के युध्य की बात कही। कालयवन युध्य करने को राजी हो गया क्योकि उसे वरदान का ज्ञान था।श्री कृष्ण को वरदान का मालूम था वह राजा मुकूचंद की तपस्या के स्थान पर कालयवन को ले जाना चाहते थे इसलिए उन्होंने बलराम और अक्रूर को साथ आने से भी मना कर दिया था।
श्री कृष्ण और कालयवन मथुरा में युध्य के लिए तैयार हुए।दोनो के बीच जैसे ही युध्य शुरू हुआ श्री कृष्ण रणभूमि छोड़ कर भागने लगे।
कालयवन भी उनको हराने के लिए उनके पीछे पीछे भागने लगा।भागते भागते श्री कृष्ण एक पहाड़ी की गुफा में छिप गए। कालयवन भी उसी गुफा में घुस गया वहा उसने एक साधु को सोया देखा उसे लगा के श्री कृष्ण उससे बचने के लिए साधु का वेश धारण कर सो गए है। उसने बिना समय गवाए उस साधु को लात मार दी।
साधु को लात पड़ते ही वह उठ गया और उनके शरीर मे आग पैदा हो गई और जैसे ही उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी वह राख हो गया।
यह साधु और कोई नही राजा मुकूचंद थे जिन्होंने इंद्र को असुरो से लडाई में जीत दिलाई थी उनके वरदान और इच्छा के अनुसार उन्होंने कलयुग के अंत तक सोये रहने का वरदान मांगा था लेकिन कालयवन ने उनकी निद्रा को भंग किया जिसका फलस्वरूप वह शरीर की आग से जल गया और राख हो गया।
इस तरह कालयवन का अंत हुआ।






