वैसे तो वीर रस की सभी कविताएं सुनने में अच्छे लगते हैं लेकिन मुझे मैथिलीशरण गुप्त जी के द्वारा रचित कविता अर्जुन की प्रतिज्ञा सबसे अधिक पसंद है।
उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा,
मानो हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा,
मुख - बाल - रवि - सम लाल होकर ज्वाला सा बोधित हुआ,
प्रलयार्थ उनके मिस वहां क्या काल ही क्रोधित हुआ?
युग - नेत्र के उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार- से,
अब रोस के मारे हुए, वे दहकते अंगार से,
निश्चय अरुणिमा - मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी,
तब तो द्रगों का जल गया सोकाश्रु जल तत्काल ही।

