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Oct 14, 2019astrology

अहोई व्रत कब और क्यों मनाया जाता है ?

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Oct 14, 2019
कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी या आठे के नाम से भी जाना जाता है।जिसका मतलब होता है अनहोनी को होनी बनाना।इस व्रत को केवल वही लोग रख सकते हैं जिनके बच्चें होते हैं क्योंकि यह व्रत बच्चों के सुख के लिए रखा जाता है।
इस दिन किसकी पूजा करे ?
इस व्रत में अहोई देवी की तस्वीर के साथ सेई और सेई के बच्चों के चित्र भी बना कर पूजे जाते हैं।इस व्रत के आखिर में करवा चौथ व्रत की तरह कथा सुनना अनिवार्य होता है। कथा सुने बिना अहोई अष्टमी का व्रत पूरा नहीं होता है |
व्रत का महत्व
हिंदू शास्त्रों के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत रखने से अहोई माता खुश हो कर बच्चों की लंबी आयु और मंगलमय जीवन का आशीर्वाद देती हैं |

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अहोई व्रत कथा

एक समय की बात है किसी गांव में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे। दीपावली से पहले साहूकार की पत्नी घर की पुताई करने के लिए मिट्टी लेने खदान गई। वहां वह कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। दैवयोग से साहूकार की पत्नी को उसी स्थान पर एक "साही" की मांद दिखाई दी। अचानक कुदाल स्त्री के हाथों से "साही" के बच्चे को लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। "साही" के बच्चे की मौत का साहूकारनी को बहुत दुख हुआ। परंतु वह अब कर भी क्या सकती थी, वह पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई।
कुछ समय बाद सहूकारनी के एक बेटे की मृत्यु हो गई। इसके बाद लगातार उसके सातों बेटों की मौत हो गई। इससे वह बहुत दुखी रहने लगी। एक दिन उसने अपनी एक पड़ोसी को "साही" के बच्चे की मौत की घटना कह सुनाई और बताया कि उसने जानबूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया। यह हत्या उससे गलती से हुई थी जिसके परिणाम स्वरूप उसके सातों बेटों की मौत हो गई। यह बात जब सबको पता चली तो गांव की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा दिया।
वृद्ध औरतों साहूकार की पत्नी को चुप करवाया और कहने लगी आज जो बात तुमने सबको बताई है, इससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। इसके साथ ही, उन्होंने साहूकारनी को अष्टमी के दिन भगवती माता तथा "साही" और "साही" के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करने को कहा। इस प्रकार क्षमा याचना करने से तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे और कष्ट दूर हो जाएंगे।
साहूकार की पत्नी उनकी बात मानते हुए कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखा व विधि पूर्वक पूजा कर क्षमा याचना की। इसी प्रकार उसने प्रतिवर्ष नियमित रूप से इस व्रत का पालन किया। जिसके बाद उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई व्रत की परम्परा चली आ रही है।

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