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Updated on Jun 5, 2026education

फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब क्यों तोड़ दी जाती है ?

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Updated on May 28, 2026

फिल्मों में अक्सर देखा जाता है, जब जज किसी मुजरिम को फांसी की सजा सुनाता है तो उसके बाद वह उस निब को तोड़ देता है । ऐसा सिर्फ फिल्मों में नहीं होता बल्कि ऐसा असल ज़िंदगी में भी होता है । जब भी जज किसी मुज़रिम को फांसी की सजा सुनाता है उसके बाद वह उस पेन की निब तोड़ देता है । इसका सामान्य रीज़न यह कहा जाता है कि उस पेन से अब दोबारा कोई और फैसला नहीं हो सकता और दूसरा कि जिस सजा के लिए मुजरिम को फांसी की सजा मिल रही है ऐसा जुर्म फिर दोबारा न हो । इस आशा के साथ पेन की निब तोड़ दी जाती है, परन्तु इसके लिए यह कहना भी गलत नहीं होगा कि जिस पेन ने किसी की ज़िंदगी का फैसला कर दिया जज उस पेन के जीवन को भी वहीं ख़त्म कर देता है ।

वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा सिर्फ भारत में ही होता है कि फांसी की सजा के बाद पेन की निब तोड़ दी जाए क्योंकि भारत में फांसी एक ऐसी सजा होती है जो सबसे बड़ी होती है । भारत में किसी बहुत बड़े अपराध के लिए ही फांसी की सजा सुनाई जाती है, और अगर एक बार सुप्रीम कोर्ट के जज ने फांसी की सजा सुनकर पेन तोड़ दिया तो उसके बाद वो खुद भी अपना फैसला नहीं बदल सकते । पेन तोड़ने का जज का मतलब ही इस बात से होता है कि उनके द्वारा किया गया फैसला अब अटल है, उस फैसले को वो खुद भी नहीं बदल सकते इसलिए वह उस पेन को ही तोड़ देते हैं ताकि दोबारा उस अपराध की सजा के फैसले के लिए कोई गुंजाईश न रहे । इसके लिए अपराधी दोबारा कोर्ट में अर्ज़ी नहीं लगा सकते , अगर कोई मुज़रिम फिर भी अर्जी लगाना चाहता है तो वह सीधा देश के राष्ट्रपति के पास अपनी एक याचिका भेज सकता है ।

फांसी का फंदा एक विशेष जगह से ही मंगवाया जाता है,। फांसी का फंदा बिहार के बक्सर जिले के कुछ कैदियों द्वारा बनवाया जाता है, और यह मनिला रस्सी से बनता है । फांसी के वक़्त जल्लाद मुजरिम से गले में फांसी का फंदा डालकर मुजरिम के कान में कहता है कि "मुझे माफ़ कर दो, मैं हुक्म का गुलाम हूँ ,मेरा बस चलता तो मैं आपको जीवन देकर सत्य के मार्ग पर चलाता " ऐसा कह कर जल्लाद मुज़रिम के सिर पर काले रंग का कपड़ा डालकर उसके गले में फांसी का फंदा लगा देता है । इसके बाद जल्लाद अपना काम करता है , जिसके कारण मुज़रिम को फांसी लग जाती है ।

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Answered on Jan 24, 2022

अक्सर आपने फिल्मों में देखा होगा की जब अपराधी को फांसी की सजा सुनाई जाती है तो अक्सर जज अपने पैन कि निब तोड़ देता है यह केवल फिल्मों में नहीं होता बल्कि असल जिंदगी में भी होता है इसके पीछे का कारण यह है कि यह अपराध फिर से दोबारा ना हो और किसी को फिर से दोबारा ऐसी सजा न देनी पड़े इस आशा से जज अपने पेन की निब को तोड़ देता है। क्योंकि भारत में फांसी एक ऐसी सजा होती है सबसे बड़ी सजा है। और जब अपने पेन की निब तोड़ देता है तो इसका मतलब यह होता है कि अब जज अपना फैसला नहीं बदल सकता है।Article image

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Updated on Jun 5, 2026

भारत में जब किसी अपराधी को अदालत द्वारा फांसी (Death Penalty) की सजा सुनाई जाती है, तो न्यायाधीश यानी जज द्वारा अपने पेन की निब तोड़ देने की एक बेहद पुरानी और गहरी परंपरा है। यह कोई कानूनी नियम या अनिवार्यता नहीं है, बल्कि एक बेहद संवेदनशील और प्रतीकात्मक प्रथा है।

पेन की निब तोड़ने के पीछे मुख्य भावना यह होती है कि जिस पेन से किसी इंसान की जिंदगी को खत्म करने का आदेश लिखा गया है, उसका इस्तेमाल दोबारा किसी भी दूसरे काम के लिए न किया जा सके। इसे एक तरह से न्याय की गंभीरता और उस फैसले के प्रति सम्मान के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा, इसका एक प्रतीकात्मक अर्थ यह भी होता है कि एक बार जब जज डेथ वारंट पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह खुद भी अपने इस फैसले को वापस या तब्दील नहीं कर सकता; यानी वह न्याय की अंतिम मुहर होती है।

यह पूरी प्रक्रिया यह भी दर्शाती है कि मृत्युदंड का फैसला सुनाना किसी भी न्यायाधीश के लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से कितना भारी होता है। निब तोड़कर जज खुद को उस फैसले के भारी बोझ से अलग करता है और यह कामना करता है कि समाज में दोबारा कभी ऐसा जघन्य अपराध न हो जिसके लिए किसी को ऐसी दर्दनाक सजा देनी पड़े।

यहां एक और दिलचस्प विषय है जिसका आप आनंद ले सकते हैं: सूर्योदय से पहले फांसी क्यों दी जाती है,बताइये ?
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